Friday, February 6, 2026

एक कलाकार जितनी कलाकृतियां बनता है वह उतनी यात्रा करता है - डॉ.चन्द्रपाल राजभर।

                 डॉ.चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

एक कलाकार जितनी कलाकृतियां बनता है वह उतनी यात्रा करता है - डॉ.चन्द्रपाल राजभर।

लघु चिंतन 
“एक कलाकार जितनी कलाकृतियाँ बनाता है, वह उतनी यात्राएँ करता है।” यह केवल एक भावात्मक कथन नहीं, बल्कि सृजन की गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक प्रक्रिया का सार है। कला स्थिर दिखाई दे सकती है, पर कलाकार कभी स्थिर नहीं होता। उसकी हर रचना उसके भीतर और बाहर की एक यात्रा का प्रमाण होती है।जब मैं किसी कैनवास के सामने खड़ा होता हूँ, तो वह केवल रंगों का खाली विस्तार नहीं होता; वह मेरे भीतर के प्रश्नों, अनुभवों, स्मृतियों और संघर्षों का खुला आकाश होता है। पहली रेखा खींचते ही एक यात्रा आरम्भ हो जाती है—विचार से आकार तक, आकार से भाव तक और भाव से समाज तक। यह यात्रा केवल हाथ की नहीं, मन की भी होती है। मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य अपने अवचेतन अनुभवों को अभिव्यक्ति के माध्यम से मुक्त करता है। कलाकार की हर कृति उसके अवचेतन का एक पड़ाव है।यदि कोई कलाकार प्रकृति का चित्र बनाता है, तो वह केवल पेड़-पौधों का चित्रण नहीं कर रहा होता; वह अपने भीतर की हरियाली, शांति और संतुलन की तलाश कर रहा होता है। जब मैंने ‘प्रकृतिक चित्रण’ और ‘चाँद चिंतन’ श्रृंखला पर कार्य किया, तो वह बाहरी दृश्य भर नहीं थे; वे मेरे भीतर चल रहे संवाद की अभिव्यक्ति थे। समाज में वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण चेतना के लिए जो बेचैनी थी, वह रंगों के माध्यम से बाहर आई। यह एक सामाजिक यात्रा भी थी—स्वयं से समाज तक।मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हर कलाकृति कलाकार के व्यक्तित्व के विकास का एक चरण होती है। एक बच्चा जब पहली बार चित्र बनाता है, तो वह रेखाओं में अपनी पहचान खोजता है। उसी प्रकार परिपक्व कलाकार अपनी हर रचना में अपने अनुभवों को पुनः जीता है। यह आत्म-परिष्कार की प्रक्रिया है। जैसे साधक हर जप के साथ भीतर गहराई में उतरता है, वैसे ही कलाकार हर कृति के साथ आत्मा की नई परत खोलता है।तार्किक रूप से भी देखें तो एक कलाकार जितनी विविध विषयों पर कार्य करता है, उतना ही उसका दृष्टिकोण व्यापक होता जाता है। यदि वह ‘वेदना’ पर चित्र बनाता है, तो उसे पीड़ा को समझना पड़ता है; यदि वह ‘पुष्प’ बनाता है, तो उसे कोमलता और सौंदर्य को आत्मसात करना पड़ता है। इस प्रकार हर विषय एक नई मानसिक और भावनात्मक यात्रा है। यह यात्राएँ भौगोलिक नहीं, बल्कि अनुभवात्मक होती हैं।समाज में भी हम देखते हैं कि जो कलाकार अधिक सृजनशील होता है, वह अधिक संवेदनशील होता है। संवेदनशीलता ही यात्रा का आधार है। बिना संवेदना के न कला संभव है, न यात्रा। जब कोई चित्रकार किसी किसान की थकी आँखों को उकेरता है, तो वह खेतों तक गया हो या न गया हो, पर उसकी आत्मा उस श्रम और संघर्ष की भूमि पर अवश्य गई होती है। यही कला की अदृश्य यात्रा है।मेरे लिए हर कलाकृति एक दर्पण है, जिसमें मैं स्वयं को नए रूप में देखता हूँ। कभी वह दर्पण मुझे मेरी सीमाएँ दिखाता है, कभी मेरी संभावनाएँ। असफल चित्र भी एक यात्रा है, क्योंकि वह मुझे सिखाता है कि अगली बार कौन-सा मार्ग अपनाना है। सफलता और असफलता दोनों ही पड़ाव हैं, और कलाकार का जीवन इन्हीं पड़ावों की श्रृंखला है।इसलिए मैं मानता हूँ कि कलाकार की सृजन-यात्रा अनवरत है। जितनी अधिक कलाकृतियाँ, उतनी अधिक आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक यात्राएँ। कला केवल दीवारों पर टंगी वस्तु नहीं, वह कलाकार की जीवित यात्रा का दस्तावेज है।

डॉ. चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)
लेखक- SWA MUMBAI

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