Sunday, January 18, 2026

स्वार्थ में दुनिया अंधी है डॉ.चन्द्रपाल राजभर

स्वार्थ में दुनिया आंधी है
सच की ऐसी तैसी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियों की ये धरती है

लाभ-लालच मा बंधि गइनी, नाता-रिश्ता टूट गवा
पइसा खातिर धरम बिकात, माटी रोवे लूट गवा।
झूठे वचनन की भरमार, सचवा रोवे सिसकइ है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

महँगी हंसी, सस्ता आँसू, बिकात इज्जत रोज अइ
मेहनतिया के हक छीन लिहिन, साहूकारन मौज अइ।
न्याय-धरम सब ठेंगा भए, गद्दी पइ बस कुर्सी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

खेती उजड़ी, मजूर हारे, शहरन लूटत गाँव अइ
सोने जइसन सपना बेंचि, जागे भूख अकाल अइ।
बोलत नाहीं अब विवेक, जुबान गिरवी धरती है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

रचना 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

Monday, December 22, 2025

पुस्तक- मोटिवेशनल गजल

1
हौसला
हौसलों की लौ अगर दिल में जली रहती है,
हर अँधेरी रात फिर खुद ही ढली रहती है।
हार मानो मत कभी हालात के तूफ़ानों से,
जिद्द की एक नाव अक्सर पार चली रहती है।
जो गिरा है वही उठने का हुनर जानता है,
चोट खाकर ही तो तक़दीर पली रहती है।
ख़्वाब सच होते हैं बस कोशिशों के साए में,
नींद आराम की मेहनत से छली रहती है।
भीड़ में खोना बहुत आसान है ऐ मेरे दोस्त,
अपनी पहचान मगर अलग बनी रहती है।
वक्त देता है परीक्षा, हौसला देता है फल,
सब्र की राह हमेशा ही भली रहती है।
जो न झुकता है कभी झूठे तक़ाज़ों के आगे,
उसकी पेशानी सदा ऊँची ढली रहती है।
गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

2
मंजिल 
चल पड़ा जो अपने दम पर, वही मंज़िल पाएगा,
भीड़ के पीछे चला तो नाम खो जाएगा।
टूटकर बिखरना भी एक सबक सिखा जाता है,
जो संभल गया वही आगे दूर तक जाएगा।
ख़ौफ़ की दीवार ऊँची सिर्फ़ नज़र आती है,
हौसलों का क़दम बढ़े तो गिर ही जाएगा।
आज जो चुप है वही कल बोलता इतिहास में,
सब्र का हर एक लम्हा रंग लाएगा।
हार के शोर में मत अपनी आवाज़ खो,
सच का साया देर से ही सही छा जाएगा।
थक के रुकना भी बुरा नहीं सफ़र में मगर,
रुक के बैठा जो हमेशा पीछे रह जाएगा।
जो जला है खुद उजाला बाँटने की चाह में,
वक़्त उसका नाम सूरज सा बताएगा।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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3
इरादा
अब झुकेंगे नहीं हम, यह इरादा लिख दिया है,
डर के माथे पर भी सच का क़ायदा लिख दिया है।

जो सहे सदियों की चुप्पी, वो भी बोले आज फिर से,
ख़ामोशी के ख़िलाफ़ हमने नारा लिख दिया है।

बेड़ियाँ टूटी नहीं तो सोच को आज़ाद कर दिया,
जेल की दीवार पर भी रास्ता लिख दिया है।

भूख ने सिखला दिया है इंक़लाब का सबक़,
सूखी रोटी ने लहू में फ़लसफ़ा लिख दिया है।

जो हुकूमत ने कहा था “मत उठाना सिर कभी”,
उसी सिर ने आज हर एक फ़ैसला लिख दिया है।

हम नहीं माँगेंगे हक़, अब छीनना सीखा है,
मुट्ठियों ने वक्त का नक़्शा नया लिख दिया है।

जो जले अँधेरों में बनकर मशाल-ए-राह,
उस शहीद ने हर नस में हौसला लिख दिया है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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4
ख़ामोश हथियार 
हमने ख़ामोशी को भी अब हथियार बना लिया,
चुप्पियों में ही बग़ावत का इज़हार कर लिया।

जो लुटाते थे सदा सपने हमारे नाम पर,
हमने उनकी नींद पर पहरा तैनात कर लिया।

भूख की भाषा समझ आई तो जाना यह भी सच,
पेट ने संसद से भी ऊँचा इन्क़लाब कर लिया।

अब किताबें सिर्फ़ अलमारी की शोभा नहीं है,
हर हर्फ़ ने ख़ुद को मशाल-ए-राह कर लिया।

जो कहे “सब ठीक है” उस झूठ से समझौता नहीं है,
हमने सच बोलने का ख़तरा स्वीकार कर लिया।

कायरों की भीड़ से रिश्ता हमारा टूट गया ,
डर को पैरों तले रौंद कर इतिहास लिख लिया।

आज जो सड़कों पे है, कल वही संविधान है,
जन ने ख़ुद को पहली बार सरकार लिख लिया।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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5
स्याही 
मैं स्याही में लहू मिलाकर सच लिख रहा हूँ,
डर की सलाख़ों पर भी आवाज़ लिख रहा हूँ।

जो बिक गई थीं सदियों से ज़मीरे सत्ता में,
उनके मुक़ाबिल नया इंसान लिख रहा हूँ।

यह जो अख़बारों में सजा झूठ का मेला है,
उस हर झूठ के सामने विद्रोह लिख रहा हूँ।

मेहनतकश के हाथ की रेखा मिटा दी गई,
उसी हथेली पर नया इतिहास लिख रहा हूँ।

मत पूछो मुझसे अदब, नर्मी, तहज़ीब अभी,
वक़्त के काग़ज़ पे मैं इन्क़लाब लिख रहा हूँ।

जो कह रहे थे “कल लिखना”, “अभी नहीं बोलो”,
उसी आज में मैं हर एक सवाल लिख रहा हूँ।

यह ग़ज़ल नहीं, यह गवाही है दौर की,
मैं अपने हिस्से का पूरा जवाब लिख रहा हूँ।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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6
प्रश्न आसान नहीं थे, फिर भी सच लिख आया हूँ,
आंसर शीट पर मैं अपना वजूद लिख आया हूँ।
जो सिखाया गया था चुप रहो, वही काट दिया,
गलत सवालों के आगे विद्रोह लिख आया हूँ।
नंबर काटे गए तो क्या, डर पास हो गया,
मैं हर एक उत्तर में हौसला लिख आया हूँ।
सिलेबस में नहीं था जो, वही सबसे ज़रूरी था,
मैं जीवन का पूरा अनुभव लिख आया हूँ।
काट दी जाएगी शायद यह कापी जाँच में,
फिर भी हर पन्ने पे इन्क़लाब लिख आया हूँ।
जो कह रहे थे “लिखना मत, यही समझदारी है”,
उनकी समझ के बाहर जवाब लिख आया हूँ।
यह परीक्षा सिर्फ़ नौकरी की नहीं थी दोस्त,
मैं आदमी हूँ—यह पहचान लिख आया हूँ।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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7
वक्त 
वक्त रुकता नहीं, मगर राह दिखा जाता है,
जो संभल जाए वही आगे निकल जाता है।
आज जो बीज पसीने से ज़मीं में बोया है,
वक्त उस बीज को कल पेड़ बना जाता है।
हार पल भर की होती है अगर दिल न थके,
वक्त ठहरे हुए पत्थर भी हिला जाता है।
जो अभी टूट के बैठा है, उसे क्या मालूम,
वक्त गिरकर भी इंसान को उठा जाता है।
कल पे टालो मत अभी जो भी ज़रूरी है यहाँ,
वक्त हर काम का अंजाम बता जाता है।
जो समय की क़द्र करता है वही जीतता है,
वक्त लापरवाह को पीछे छोड़ जाता है।
आज चुपचाप जो मेहनत में लगा रहता है,
वक्त कल उसका ही सिक्का चला जाता है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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8
जरूरी है 
हर बात में जीत नहीं, हार भी ज़रूरी है,
ज़िंदगी समझने को ठोकर भी ज़रूरी है।
कहने से कुछ नहीं होता, करना ही पड़ता है,
ख़्वाबों के सच होने को मेहनत ज़रूरी है।
जो आज थक कर बैठ गया, वो कल रोएगा,
थोड़ा सा चलते रहना हर दिन ज़रूरी है।
लोगों की बातों में मत अपना वक़्त गँवाओ,
ख़ुद की निगाह में इज़्ज़त ज़रूरी है।
सबका साथ मिले, ये मुमकिन नहीं यहाँ,
ख़ुद पर भरोसा रखना सबसे ज़रूरी है।
जल्दी में फैसले अकसर गलत निकलते हैं,
कुछ बातों में ठहरना भी ज़रूरी है।
ज़िंदगी आसान नहीं, पर नामुमकिन भी नहीं,
बस रोज़ थोड़ा बेहतर होना ज़रूरी है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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9
किताब 
हर किताब सिर्फ़ काग़ज़ की कहानी नहीं होती,
कुछ किताबें ज़िंदगी जीना सिखा देती हैं।
जो सवाल मन में दबे रहते हैं बरसों तक,
एक सच्ची किताब उन्हें बोलना सिखा देती है।
अकेलेपन में जब कोई साथ नहीं देता,
तब किताब ही इंसान को सहारा देती है।
जो ठोकरों से थक कर रुक गया था राह में,
किताब उसे फिर से खड़ा होना सिखा देती है।
हर पन्ना कहता है—रुक मत, आगे बढ़,
किताब हार के आगे झुकना मना कर देती है।
डिग्रियाँ नहीं, सोच बदलती है असल में,
किताब आदमी को आदमी बना देती है।
जो रोज़ थोड़ा पढ़ता है, थोड़ा समझता है,
वही किताब एक दिन मुक़द्दर लिखा देती है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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10
कदम
पहला क़दम ही अक्सर सबसे भारी होता है,
चल पड़े तो रास्ता खुद ही सहारा होता है।
रुक के सोचना ठीक है, डर के बैठना नहीं,
हर सफ़र एक छोटे क़दम से ही शुरू होता है।
जो आज एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाता,
कल वही अपनी जगह पर ही ठहरा होता है।
क़दमों की आवाज़ से डरता है अँधेरा भी,
चलने वाला आदमी कभी अकेला होता है?
धीरे चल, मगर रुक मत—यही उसूल रख,
क़दम थमे तो सपना भी अधूरा होता है।
हर रोज़ एक क़दम ईमानदारी से बढ़ाओ,
यही आदत एक दिन बड़ा मुक़द्दर होता है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

Sunday, December 21, 2025

तुम्हारी नजरें कुछ कह जाती हैं -गीत

तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,
बिन छुए ही जो दिल को छू जाए,
वो हर धड़कन मेरी बन जाती हैं।

होठों की लकीरों में छुपी बातों को,
आँखों की चमक यूँ उजागर करती है,
एक मुस्कान की हल्की सी बारिश,
रूह के आँगन को तर करती है।
सांसों में घुली जो खुशबू तुम्हारी,
हर लम्हा नया एहसास जगाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

पलकों का झुकना, फिर नज़र उठना,
कह जाता है जो लफ्ज़ न कह पाए,
एक नज़र में सौ वादे लिखकर,
सीधे दिल के पन्ने पर उतर जाए।
नज़रों का ये जादू संभाले न संभले,
नीयत भी राहें बदल जाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

उल्फत की गलियों में जो कदम रखा,
एक धड़कन वहीं ठहर सी गई,
तुम्हारी आँखों में जो घर पाया,
मेरी हर तन्हाई बिखर सी गई।
सीने में जो धड़कन आज भी धड़के,
वो तुम्हारी धड़कन कहलाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं

गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

Friday, December 19, 2025

स्कूल गीत

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

मेहनत करबा ता ,मेहनतिया बोली होss, 
चमक उठी तोहर,किस्मतिया बोली हो।।
गाँव नगरिया से निकाला पाऊंवा हो, ।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

झोलवा औ, कंपनियां , कितबिया लेला हो।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

गरीबी के दीवार ई ,गिरेगी हिम्मत से
होला सपनवा ,साकार मेहनत से
 
इल्मों का दीप जरेला हिम्मत से, 
अंधियारा दूर भगवा, तू पढ़ी ला मेहनत से

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

जिंनगी तोहार औ, दुआर सुधर जाई
पढ़ी-लिखी लेबा तो परिवार सुधर जाए 
गांव समाज के सम्मान बढ़ जाए
देशवा के अपने, मान बढ़ी जाई
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।।।

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

गीत 
डॉक्टर चन्द्रपाल राजभर

Wednesday, November 19, 2025

प्रेम हमेशा एक तरफा होता है -डॉ.चन्द्रपाल राजभर का एक चिंतन

प्रेम अक्सर एकतरफा ही होता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय देने की क्षमता रखता है, लेकिन पाने की अपेक्षा से भरा होता है। मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेम एक ऐसी ऊर्जा है जो प्रवाह चाहती है—यह रोका जाए तो दुख देती है, और बहने दिया जाए तो शक्ति बन जाती है। समस्या यह नहीं कि प्रेम एकतरफा है; समस्या यह है कि हम प्रेम को दो-तरफा सौदे की तरह देखना चाहते हैं। जबकि प्रेम का स्वभाव ही एकतरफा है—पहले देना, फिर स्वीकारना।

मनुष्य जब किसी से प्रेम करता है, तो वह प्रेम उसके भीतर की संवेदनाओं, अनुभवों और स्मृतियों से जन्म लेता है। दूसरे व्यक्ति का उस प्रेम को समझना या न समझना अक्सर संयोग होता है। जैसे एक चित्रकार कैनवास पर रंग भरता है—वह रंग उसकी अपनी आत्मा से आते हैं, दर्शक उनसे जुड़े या न जुड़ें, उस सृजन की शक्ति को कम नहीं कर सकते। प्रेम भी ठीक ऐसा ही है—वह अपने प्रदर्शन के लिए दूसरे की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता।

उदाहरण के लिए, एक युवक अपनी सहकर्मी को बहुत सम्मान और स्नेह देता है। वह उसके हर संघर्ष को समझता है, उसकी हर सफलता पर गर्व महसूस करता है, लेकिन वह सहकर्मी इस भावना से अनजान रहती है। बहुत समय बाद जब उसे पता चलता है, वह कहती है—“मैंने कभी इस प्रकार नहीं सोचा।” यह कथन एकतरफा प्रेम की सच्चाई को बताता है। युवक का प्रेम उस स्वीकृति पर आधारित नहीं था; वह उसके हृदय की प्राकृतिक प्रतिक्रिया थी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह एक स्वस्थ प्रेम है, क्योंकि इसमें अधिकार नहीं, केवल अनुभव है।

एकतरफा प्रेम दुख नहीं देता; अपेक्षा देती है। जब हम प्रेम को लौटाने की चाह छोड़ देते हैं, तब प्रेम हमारे भीतर एक शक्ति बन जाता है। यह मन को परिपक्व करता है, संवेदनशील बनाता है और मनुष्य को भीतर से गहराई देता है। कई बार एकतरफा प्रेम व्यक्ति को इतना मजबूत बना देता है कि वह अपनी प्रतिभा, कला और जीवन में अद्भुत उन्नति कर लेता है, क्योंकि अस्वीकार से नहीं, बल्कि भावनाओं की तीव्रता से ऊर्जा उत्पन्न होती है।

सच तो यह है कि प्रेम दो तरफा तभी होता है जब दो दिलों की दिशाएं संयोगवश एक जैसी हों। लेकिन प्रेम शुरू हमेशा एकतरफा होता है—पहले एक दिल धड़कता है, फिर दूसरा जागता है। इसलिए एकतरफा प्रेम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे पवित्र क्षमता है—निःस्वार्थ होकर महसूस करना, समझना और किसी के लिए शुभकामना करना। यही प्रेम को महान बनाता है, और यही उसे अनंत बनाता है। और एक समय ऐसा आता है दोनों मिलकर फिर एक हो जाते हैं और प्रेम फिर एक ही हो जाता है यानी कि एक तरफा 

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
 (आर्टिस्ट )

Tuesday, November 18, 2025

चित्रकारिता से लोग दूरियां बना रहे हैं- डॉ.चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट का एक चिंतन

आज लोग चित्रकारिता से दूरियां इसलिए बना रहे हैं क्योंकि उनका मन कला की गहराई को समझने से पहले ही बाज़ार और लाभ-हानि की भाषा में उलझ जाता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है कि मनुष्य उस काम से बचता है, जिसमें तुरंत परिणाम दिखाई न दे। लेकिन कला—विशेषकर चित्रकला—एक ऐसा साधन है जहाँ फल से पहले अभ्यास, अनुशासन, धैर्य और आत्मसंवाद की लंबी यात्रा होती है। आज की तेजी से भागती दुनिया में लोग इस यात्रा को बोझ समझ लेते हैं।चित्रकला सिर्फ कागज़ पर रंग भरना नहीं है, बल्कि मन की परतों को खोलना है। बच्चा जब पहली बार रेखाएँ बनाता है तो वह रेखाएँ उसके अंतर्मन का आईना होती हैं। परंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसकी तुलना शुरू कर देता है—"इससे अच्छा तो फलाँ बनाता है", "कला में करियर नहीं बनता", "सिविल, बैंक या कंप्यूटर सीखो"। यह नकारात्मक तुलना धीरे-धीरे उसकी सृजनात्मकता को डरा देती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, भय और संकोच वह दो दीवारें हैं जो किसी भी कलाकार की उड़ान रोक देती हैं।उदाहरण के लिए, एक छात्र जिसने कक्षा 6 में कमाल की पेंटिंग बनाई थी, उसने 10वीं में आते-आते रंग उठाना तक बंद कर दिया। कारण पूछा गया तो बोला—“सर, लोग कहते हैं कला से कुछ बनता नहीं।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं होते, यह व्यक्ति की आत्म-धारणा पर चोट करते हैं। कला छोड़ देने की शुरुआत यहीं से होती है।दरअसल, कला कमाने से पहले कमल की तरह खिलना सिखाती है। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग रखता है, तो वह सिर्फ दृश्य नहीं बनाता बल्कि अपना मन साफ करता है, तनाव कम करता है और भावनाओं को स्वस्थ दिशा देता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से कला से जुड़ा होता है, वह मानसिक रूप से अधिक स्थिर, अधिक संवेदनशील और अधिक रचनात्मक होता है।समस्या कला में नहीं, हमारी सोच में है। लोग यह समझ नहीं पाते कि चित्रकला जीवन को सिर्फ सुंदर नहीं बनाती, बल्कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है। जिस दिन समाज यह महसूस कर लेगा कि कलाकार बनने का अर्थ सिर्फ पेंटिंग बेचना नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ना है, उस दिन चित्रकारिता से दूरियां नहीं, नजदीकियां बढ़ेंगी।चित्रकला मनुष्य को वह सिखाती है जो कोई पुस्तक नहीं सिखाती—धैर्य, संतुलन, गहराई, और जीवन के रंगों का वास्तविक अर्थ। इसलिए मेरा मानना है कि लोग चित्रकारिता से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें फिर से रंगों की भाषा सिखाने की जरूरत है। जब उन्हें यह एहसास होगा कि कला सिर्फ कैरियर नहीं, एक मनोवैज्ञानिक उपचार है, तब चित्रकारिता फिर से घर-घर में जन्म लेगी।

Monday, November 10, 2025

विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है-डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन


(विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है)डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन

इंसान का जाना एक भौतिक घटना है — शरीर की उपस्थिति का अंत या दूरी — लेकिन उसकी बेवफाई एक मानसिक घटना है, जो चेतन और अवचेतन मन दोनों में गहरी छाप छोड़ जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इंसान की स्मृतियाँ केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उन घटनाओं से जुड़े भावनात्मक अनुभवों से निर्मित होती हैं।जब कोई हमें धोखा देता है, तो मस्तिष्क में एमिग्डाला (amygdala) नामक भाग सक्रिय हो जाता है, जो भय, दर्द और असुरक्षा जैसी भावनाओं को लंबे समय तक संचित रखता है। इसीलिए शरीर तो भूल जाता है, पर मन नहीं। यह मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है कि सकारात्मक भावनाएँ जल्दी मिट जाती हैं, जबकि नकारात्मक अनुभव लंबे समय तक स्मृति में स्थिर रहते हैं।
दरअसल, बेवफाई केवल किसी व्यक्ति से विश्वासघात नहीं होती, बल्कि यह हमारे स्व-मूल्यांकन पर भी प्रहार करती है। व्यक्ति सोचता है कि “मैं इतना गलत क्यों था कि धोखा खा गया?” — और यही प्रश्न उसकी चेतना को बार-बार कुरेदता रहता है। यही कारण है कि इंसान चला जाए तो शरीर अनुपस्थित हो जाता है, लेकिन उसकी बेवफाई “अनुभव” बनकर मन के भीतर जीवित रहती है।मनोविज्ञान कहता है कि जब हम किसी से गहरा जुड़ाव बनाते हैं, तो मस्तिष्क में “ऑक्सीटोसिन” और “डोपामिन” जैसे रासायनिक हार्मोन उत्पन्न होते हैं, जो आनंद और विश्वास का संकेत देते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति बेवफाई करता है, तो वही रासायनिक तंत्र ध्वस्त हो जाता है — और मस्तिष्क को यह झटका लंबे समय तक भावनात्मक दर्द के रूप में महसूस होता है।इसलिए, यह कहना एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है कि —
“इंसान चला जाता है, मगर उसकी बेवफाई याद रहती है,”
क्योंकि शरीर की दूरी से अधिक विश्वास का टूटना दर्द देता है। समय बीतता है, लोग बदलते हैं, लेकिन बेवफाई की स्मृति हमारे आत्म-सम्मान की दरारों में हमेशा गूंजती रहती है — जब तक व्यक्ति उसे क्षमा या स्वीकृति के माध्यम से पार नहीं कर लेता। यह अनुभव हमें सिखाता है कि हर विदाई हानि नहीं होती, कुछ विदाइयाँ स्वयं की पहचान का आरंभ होती हैं।

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
(चित्रकार, चिंतक एवं मनोवैज्ञानिक लेखक)

Monday, October 27, 2025

गीत आभा दिखा दे चन्दा - डॉ चन्द्रपाल राजभर

रात बड़ी लम्बी, आनन दिखा दे चन्दा,
नींद नहीं आती, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा १ :
सपनों के सागर में कोई किनारा नहीं,
यादों की लहरों का अब उतारा नहीं,
दिल की बुझी लौ को, फिर से जला दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा २ :
चुपके से कोई दर्द दिल में उतरता है,
आँखों के आँगन में आँसू ठहरता है,
थोड़ी सी राहत की छाया बना दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ३ :
तनहा ये दिल रातों में तड़पता बहुत है,
सपनों की दुनिया में भटकता बहुत है,
सुकून का कोई लम्हा सजा दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ४ :
दूर कहीं वो चेहरे की झलक सोई है,
तेरी किरणों में उसकी झलक खोई है,
उस याद की परछाईं दिखा दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ५ (समापन):
मन की व्यथा अब गीतों में ढल जाती है,
हर धड़कन तेरे नाम पे चल जाती है,
रात का सन्नाटा महका दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

Monday, October 20, 2025

पवन गीत- लेखक डॉ चन्द्रपाल राजभर

पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।
फूलों से खुशबू अब बरसे,
मन में उठे मीठी बरसात॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

बादल छाए, नभ मुस्काए,
जाने कहाँ तू खोई जाए।
तेरी हँसी का झोंका आए,
मन में मेरे उल्लास जगाये।।
पवन बोले जब, प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

सावन में गाए, साजन तेरे,
झरनों में बहें ,अरमान मेरे।
सपनों में तेरा ,नाम पुकारे,
प्रीत की अलख, फिर जगाये॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

चाँद सा गोरा मुखड़ा तेरा,
पवन करे अब तेरा पहरा।
साँसों में तेरी खुशबू ठहरे,
मन को मिले तेरी सौगात॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।
फूलों से खुशबू अब बरसे,
मन में उठे मीठी बरसात॥

लेखक 
डॉ चन्द्रपाल राजभर 

Saturday, September 13, 2025

गीत डा. चन्द्रपाल राजभर

नज़र से नज़र मिली और कुछ हो गया,
दिल में छुपा दर्द फिर से जगा हो गया।

वो वादे, वो कसमें, सब झूठे लगे,
मोहब्बत के किस्से अधूरे लगे।
जो सोचा था साथी वही बेवफ़ा,
मेरी ज़िंदगी का सफ़र बदल गया।

नज़र से नज़र मिली और कुछ हो गया,
दिल में छुपा दर्द फिर से जगा हो गया।

तेरे बाद दुनिया सुनी-सुनी लगे,
हर राह में जैसे तू खो सा गये।
जुदाई ने छोड़ा है ज़ख्मों का निशां,
मेरा हंसता जहाँ अब तन्हा हो गया।

नज़र से नज़र मिली और कुछ हो गया,
दिल में छुपा दर्द फिर से जगा हो गया।

तेरी याद हर रात जगाती रही,
ख़ामोशी भी मुझसे सवालात करे।
मोहब्बत के बदले मिली बेवफ़ाई,
मेरे सपनों का घर अब ढह-सा गया।

नज़र से नज़र मिली और कुछ हो गया,
दिल में छुपा दर्द फिर से जगा हो गया।
___________
2
नज़र से नज़र मिली, कुछ कुछ होने लगा,
दिल के उजड़े सफ़र में दर्द बोने लगा।

वो मुस्कुराए तो लगा जैसे चाँद खिल गया,
ज़ख़्म पुराने थे मगर फिर हरा हो गया।
क़दम थम गए वहीं, सब कुछ खोने लगा,
नज़र से नज़र मिली, कुछ कुछ होने लगा।

वो जो क़रीब थे, पर किसी और के हो गए,
सपनों के घर मेरे, आँधियों में खो गए।
साँसों में उनके नाम का ज़हर घुलने लगा,
दिल के उजड़े सफ़र में दर्द बोने लगा।

रातें उदास हैं, नींद अब आती नहीं,
यादों की आग है, आँख बुझ पाती नहीं।
हसीन पल बेवफ़ाई में कहीं खोने लगा,
नज़र से नज़र मिली, कुछ कुछ होने लगा

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3
टूटे सपनों की चुभन में जी रहा हूँ मैं,
तेरे बिन हर रोज़ ज़हर पी रहा हूँ मैं।

दिल की हर धड़कन तेरा नाम लेती है,
राहों में तन्हाई ज़हर घोल देती है।
छोड़ के मुझको तू कहाँ जा रही है,
क्यों झूंठी मोहब्बत का ग़म दे रही है।

टूटे सपनों की चुभन में जी रहा हूँ मैं,
तेरे बिन हर रोज़ ज़हर पी रहा हूँ मैं।

तेरी जुदाई ने जलाया है दिल को,
आँखों ने रो-रो के भुलाया है ग़म को।
फिर भी तेरा नाम लब पर है आता,
ज़ख़्मों को छुप-छुप के दिल सहलाता।

टूटे सपनों की चुभन में जी रहा हूँ मैं,
तेरे बिन हर रोज़ ज़हर पी रहा हूँ मैं।

गीत 
डॉक्टर चन्द्रपाल राजभर 
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4
तेरी यादों ने दिल को रुला दिया,
सारे सपनों का शहर जला दिया।
जो कसम खाई थी साथ निभाने की,
उस कसम को भी तूने भुला दिया।

तेरी यादों ने दिल को रुला दिया,
सारे सपनों का शहर जला दिया।

चाँदनी रात में तन्हा खड़ा हूँ मैं,
तेरे बिन आज भी अधूरा पड़ा हूँ मैं।
राह देखता रहा हर घड़ी तेरा,
पर नसीबों से हारकर लड़ा हूँ मैं।

तेरी यादों ने दिल को रुला दिया,
सारे सपनों का शहर जला दिया।

पल-पल तेरी कमी सताती है,
खामोशी में भी आवाज़ आती है।
दिल कहता है तू लौट आए कभी,
पर किस्मत हमें दूरियां दिलाती

तेरी यादों ने दिल को रुला दिया,
सारे सपनों का शहर जला दिया।

रचना 
डॉक्टर चन्द्रपाल राजभर 
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5
बेवफाई का दर्द कैसे सही कोई

दिल के ज़ख्म को कैसे छुपाए कोई,
टूटी हुई सांसों को कैसे जुड़वाएं कोई।
बेवफाई का दर्द कैसे सहे कोई,
आंसुओं को बहाकर कैसे जिए कोई।

वो जो कसम खा के गए थे साथ निभाने को ,
छोड़ गए राह में, किसको बताने को।
दिल में अंधेरों का साया लिए कोई,
बेवफाई का दर्द कैसे सहे कोई।

सपनों की चादर जली राख बन गई,
यादों की खुशबू भी आह बन गई।
टूटी उम्मीदों में रोता रहा कोई,
बेवफाई का दर्द कैसे सहे कोई।

गीत 
डाॅ चन्द्रपाल राजभर 
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,6
दिल की किताब में तूने, नया ज़ख़्म लिख दिया,
मेरे अरमानों को जैसे, सरेआम जला दिया।

सपनों की दुनिया टूटकर, खामोश हो गई,
तेरे बिना ज़िंदगी ,अधूरी-सी हो गई।

राहों में तेरे कदमों के, निशाँ ढूँढता रहा,
आँसुओं के दरिया में ,मैं ही डूबता रहा।

वक़्त के हाथों से मेरी, खुशियाँ छिन गईं,
तेरी बेवफाई से मेरी, साँसें सिमट गईं।

चाँदनी रातें अब, अंधेरों में बदल गईं,
धड़कनों की ताल भी,सिसकियों में ढल गईं।

तू गया छोड़कर मगर यादें नहीं गईं,
तेरे बिना ये आँखें कभी सूखी नहीं रहीं।

दिल की किताब में तूने, नया ज़ख़्म लिख दिया,
मेरे अरमानों को जैसे, सरेआम जला दिया।

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7

जिसे अपना समझा, वही गैर निकला,
वफ़ाओं के बदले ,वो ख़ंजर निकला।
तेरी कसमों पे जो ,दिल ने भरोसा किया,
वो रिश्ता भी झूठा, और जुदा निकला।
जिसे अपना समझा, वही गैर निकला,

मेरे आँसुओं से भी ,तुझे प्यार न हुआ,
तेरी मुस्कानों में मेरा ,इकरार न हुआ।
दिल को बेचैन किया, यादों ने सताया,
तेरे जाने के बाद जीना,मेरा जीना न हुआ।
जिसे अपना समझा, वही गैर निकला,

जो कहता था हर पल "सिर्फ़ मेरा रहेगा",
वो किसी और की बाहों में,सुकून खोजेगा।
चले आओ कभी देखो मेरी तन्हाई,
तेरे बिना ये ज़िंदगी , बेअसर रहेगी।
जिसे अपना समझा, वही गैर निकला,
वफ़ाओं के बदले ,वो ख़ंजर निकला।

गीत 
डाॅ.चन्द्रपाल राजभर 

8
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बेवफ़ाई करके वो, मुस्कुरा रहे हैं,
घमण्ड को अपने ,दिखा रहे हैं।
नादान इतना भी, नहीं समझते,
प्यार करके वो, छुपा रहे हैं।

दिल को तोड़ कर ,चैन पा लिये हैं,
आंसुओं से चेहरा को ,छुपा लिये हैं।
हम तड़पते रहे ,उनकी यादों में,
वो बेगानों से रिस्ता, बना लिया हैं।

वो जुदाई को ,जीत मान बैठे हैं 
मेरी चाहत को, रीत मान बैठे हैं।
वो अंधेरों में रोशनी, ढूंढते तो हैं,
मगर खुद को , हार मान बैठे हैं।

हर सितम का बोझ, हम उठा रहे हैं,
टूट कर भी हंसी, दिखा रहे हैं।
सच है कि जालिम बड़े बेख़बर हैं,
प्यार की आग को, जो हवा दे रहे हैं।

गीत 
डाॅ. चन्द्रपाल राजभर 
आर्टिस्ट 
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 9
चन्द्रपाल राजभर हैं रंगों के कलाकार,
कैनवास पर बुनते सपनों के संसार।
हर चित्र में दिखाते सच्चे व्यवहार,
भारत का गौरव, युगों के आधार।।
चन्द्रपाल राजभर हैं रंगों के कलाकार,

कभी पेड़ों में हरियाली की गूँज है,
कभी वेदना में जीवन की खोज है।
तूलिका से भरते हैं कृतियों में प्यार,
संदेश बन जाते हैं ऐसे चित्रकार।।
चन्द्रपाल राजभर हैं रंगों के कलाकार,

शब्दों में कविता, सुरों में गीत है,
चित्रों में विज्ञान, विचारों की रीत है।
जन-जन में जगाते उजियारा अपार,
डॉ. राजभर हैं सच्चे संस्कार।।
चन्द्रपाल राजभर हैं रंगों के कलाकार,

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10

ग़मों के बादलों में भी, उजाले फिर खिलेंगे,
चले जो हौसले लेकर, वो मंज़िलें फिर मिलेंगे।

ठहर न जा तू राह में, ये मोड़ भी गुजर जाएंगे,
जो जले हैं दीप दिल के, वो शहर भी निखर जाएंगे।
मिटा के ज़ख्म सीने के, नए सपने सिलेंगे,
ग़मों के बादलों में भी, उजाले फिर भी खिलेंगे।

अंतरा 2:
हवाओं ने अगर छीना, तो फूल फिर से खिलेंगे,
कदम जो डगमगाए हैं, वो राह फिर सँभलेंगे।
हर इक अंधेरी रात में, सितारे झिलमिलेंगे,
चले जो हौसले लेकर, वो मंज़िलें भी मिलेंगे।

अंतरा 3:
जहां हो दर्द, वहां भी कुछ रौशनी उतरती है,
उम्मीद की किरन हर बार, नई कहानी करती है।
जो हार मान जाए वो, कहानी से मिटेंगे,
ग़मों के बादलों में भी, उजाले फिर भी खिलेंगे।

अंतिम पंक्तियाँ:
बदलेंगे हालात जब, तू हौसला दिखाएगा,
तूफ़ान भी रुकेंगे जब, तू दीप जलाएगा।
समय के साथ सागर में, किनारे भी मिलेंगे,
चले जो हौसले लेकर, वो मंज़िलें भी मिलेंगे।

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"तेरे जाने के बाद"

तेरे जाने के बाद, दिल ये संभलता नहीं,
तेरी यादों का ज़हर अब निकलता नहीं।
हर तरफ तू ही तू है, मगर तू नहीं,
तेरे जाने के बाद दिल बहलता नहीं।

हमने चाहा तुझे, जैसे खुदा कोई,
पर तू निकला वही, जिसपे भरोसा न कोई।
मेरे अश्कों से तेरी राह सजती रही,
पर तुझे फर्क क्या, दर्द में भी दुआ दी कोई।

तेरी तस्वीर से बातें मैं करता रहा,
हर धड़कन में तेरा नाम भरता रहा।
तू हँसी बाँट के ग़म दे गई ज़िंदगी में,
मैं तो टूटी हुई साँसें गिनता रहा।

तेरे बिना अब कोई रौशनी लगती नहीं,
हर खुशी भी मुझे अब खुशी लगती नहीं।
दिल ने माँगा था बस तेरा साथ ज़रा सा
पर तू ठुकरा गई, वजह लगती नहीं।

तेरे जाने के बाद, दिल ये संभलता नहीं,
तेरी यादों का ज़हर अब निकलता नहीं।
हर तरफ तू ही तू है, मगर तू नहीं,
तेरे जाने के बाद दिल बहलता नहीं।


Friday, August 22, 2025

प्रेरणा गीत डॉ. चद्रपाल राजभर

प्रेरणा गीत 🌟

गिरते हुए तारे भी, उजाला छोड़ जाते हैं,
संघर्षों की राहों में, हीरे गढ़े जाते हैं।

मंज़िल नहीं कठिन है, बस हिम्मत को जगाना है
अंधकार चाहे हो कितना, दिया फिर भी जलाना है।
जो थक कर रुक न जाएँ, वही तो जगमगाते हैं
संघर्षों की राहों में, हीरे गढ़े जाते हैं।

तूफ़ान रुक ही जाए, अगर नाविक अडिग हो जाए
पर्वत भी झुकें आगे, अगर साहस खड़ा हो जाए।
विश्वास जिनके भीतर हो, वही इतिहास बनाते हैं
संघर्षों की राहों में, हीरे गढ़े जाते हैं।

आशा की किरण बनकर, बढ़ो तुम देश में आगे 
सपनों को साकार करो, उठो नव प्रयास से आगे।
जिनके कदम थकते नहीं, वही दुनिया बदलते हैं,
संघर्षों की राहों में, हीरे गढ़े जाते हैं।

गीत 
डाक्टर चन्द्रपाल रजभर

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2
बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली,
मेहनत से सजे बगिया, तो हर मौसम रहे आली।

आंधी चाहे आये तो, न घबराना तुम साथी,
बीजों में है उजियारा, वही देता है गवाही।
बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली…

पत्थर राह में कितने, कदम को रोक पाएंगे,
जो चलते दृढ़ इरादे, वो मंज़िल छू ही जाएंगे।
पसीने की ही बूँदों से, बनें सपनों की थाली,
बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली…

अंधेरा जब भी छाएगा, उजाला संग आएगा,
हौसला अगर न टूटे तो, समय भी रंग लाएगा।
उठा लो दीप विश्वास का, रहे न रात काली,
बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली…


Thursday, August 21, 2025

उल्टी गतिविधि - डाॅ. चन्द्रपाल राजभर

उल्टी बोली – सीधी समझ" खेल

कैसे खेलें:

1. समूह को दो टीमों में बाँट दीजिए।

2. एक टीम का सदस्य कोई सामान्य वाक्य बोलेगा, लेकिन शब्दों का क्रम उल्टा करके।

जैसे: "मैं पानी पी रहा हूँ।" → "हूँ रहा पी पानी मैं।"

3. दूसरी टीम को इसे सही वाक्य में बदलकर बताना होगा।

4. सही जवाब देने पर अंक मिलेंगे।

5. जो टीम सबसे ज़्यादा वाक्य सही बनाएगी, वही जीतेगी।

मजेदार उदाहरण:

"खा खाना सबने आज" → "आज सबने खाना खा लिया।"

"हूँ रहा नाच मैं" → "मैं नाच रहा हूँ।"

"है प्यारा कितना यह खेल" → "यह खेल कितना प्यारा है।"

 डाक्टर चन्द्रपाल राजभर.

Sunday, August 10, 2025

पर्यावरण पर लेख एवं संक्षिप्त परिचय

🎤 तपती धरती पर संवेदना की हरियाली: डाॅ.चन्द्रपाल राजभर का पर्यावरणीय योगदान
नाम - डॉ.चन्द्रपाल राजभर 
पिता/पति का नाम-: राम अनुज राजभर 
जन्म स्थल-: ग्राम सजमपुर जनपद सुल्तानपुर
जन्मतिथि -:06/07/1990 
राष्ट्रीयता-:भारतीय 
पता 
स्थाई पता -:ग्राम सजमपुर पोस्ट हरपुर थाना अखण्डनगर तहसील कादीपुर जनपद सुलतानपुर उत्तर प्रदेश पिन कोड 22 8172
वर्तमान पता-: प्राथमिक विद्यालय रानीपुर कायस्थ कादीपुर जनपद सुलतानपुर उत्तर प्रदेश पिन कोड 228145 
ई-मेल-:chandrapal6790@gmail.com
मोबाइल नम्बर-:9721764379,7984612205
शिक्षा-: बीटीसी,एम.ए.(चित्रकला)मास्टर आॅफ योगा,मास्टर आॅफ जर्नलिज्म(MJ) डॉक्ट्रेट उपाधि (ड्राइंग पेंटिंग)
पद-
चित्रकारिता /बेसिक शिक्षा विभाग के प्राथमिक विद्यालय रानीपुर कायस्थ ब्लॉक-कादीपुर में सहायक अध्यापक
कार्यक्षेत्र /विधा-: कला एवं शिक्षा
वर्तमान पद पर सेवा -
राष्ट्रीय अध्यक्ष (कला एंव शिक्षक विंग) क्राइम इन्फार्मेशन ब्यूरो इण्डिया, 
जिला आईटी सेल प्रभारी आॅल टीचर/इम्पलाईज बेलफेयर ऐसोशिऐशन उत्तर प्रदेश
जिलाध्यक्ष क्राइम इन्फार्मेशन ब्यूरो इण्डिया
जिला मीडिया प्रभारी उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ सुल्तानपुर 
लेखक गीतकार- (SWA) स्क्रीन राइटर एसोसिएशन अंधेरी मुंबई
संपादक(पूर्व)नयी दिशा पत्रिका
लेखक- प्रकृति चित्रण पुस्तक आईजी/इण्टरमीडिएट), ग़ज़ल अभिलाषा दर्द-ए-बेवफाई खण्ड-१, ग़ज़ल अभिलाषा दर्द-ए-तन्हाई खण्ड-2, अभिलाषा मोटिवेशनल ग़ज़ल खण्ड-3
सहायक अध्यापक वेसिक शिक्षा विभाग सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश
कवि,लेखक,चित्रकार,पत्रकार, मूर्तिकार ,संगीतकार, सिंगर,शिक्षक,सोसल ऐक्टविष्ट, 
वैज्ञानिकवादी सामाजिक कला चिन्तक
 1. परिचय: जब तपिश ने चेतना जगाई
बढ़ती गर्मी, तेज़ धूप और पर्यावरणीय असंतुलन ने जब मन को विचलित किया, तब मेरे भीतर एक भाव जगा कि अगर आज भी प्रकृति के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल ताप, प्रदूषण और सूखे भविष्य की विरासत पाएंगी। मैं डाॅ.चन्द्रपाल राजभर, एक चित्रकार, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता, वर्षों से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य कर रहा हूं। मेरा मानना है कि प्रकृति केवल चित्रों में रंगों का विषय नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। प्रकृति के प्रति मेरा प्रेम केवल कैनवास तक सीमित नहीं रहा, वह पौधों, वृक्षों और हरियाली में भी प्रकट होता है।



 2. वृक्षारोपण की प्रेरणा: तपती धूप से उपजा संकल्प
वृक्षारोपण की प्रेरणा मुझे मार्च की उस दोपहर से मिली जब विद्यालय परिसर में खड़ा होकर मैंने सूरज की तीखी किरणों को सीधे महसूस किया। उस समय मन में एक विचार कौंधा—"अगर आज छांव नहीं बनाई गई, तो कल कोई छांव मिलेगी ही नहीं।" उसी क्षण मैंने ठान लिया कि पर्यावरण को बचाने का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी तरीका यही है कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं। मैंने ढिटर का एक पौधा लगाया, जो आज एक सुंदर, घना वृक्ष बन चुका है और विद्यालय में आने वाले बच्चों को छांव देता है।

 3. अब तक कुल लगाए गए पौधों की संख्या
वर्ष 2007 से लेकर अब तक, मैंने अपने विद्यालय, घर, गाँव और विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर लगभग 1200 से अधिक पौधे लगाए हैं। यह कार्य मेरे लिए कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन गया है। इन पौधों को लगाना मेरे लिए किसी सामाजिक सेवा से कम नहीं। हर पौधा मेरे लिए एक जीवन के अंकुर के समान है, जो भविष्य को सांसें देगा।

 4. वृक्ष बन चुके पौधों की संख्या
इन लगाए गए पौधों में से अब तक लगभग 402 पौधे पूर्ण रूप से वृक्ष बन चुके हैं। कुछ विद्यालय के बच्चों की देखरेख में, कुछ ग्रामीणों द्वारा संरक्षित किए गए, और कुछ स्वयं मेरी देखरेख में बड़े हुए हैं। ढिटर, नीम, पीपल, आम,अमरूद, सहजन, अर्जुन और आम जैसे पेड़ आज अपनी शाखाओं में न केवल छांव देते हैं, बल्कि पर्यावरण को शुद्ध भी करते हैं। इन वृक्षों ने यह प्रमाणित किया है कि एक व्यक्ति की पहल समाज को बदल सकती है।

5. पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता का कार्य
सिर्फ पेड़ लगाना काफी नहीं होता, लोगों को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करना ज़रूरी होता है। मैंने बच्चों को प्रकृति की महत्ता समझाने के लिए विशेष कक्षाएं चलाईं। दीवारों पर प्रेरक पर्यावरणीय चित्र बनवाए, स्कूल के हर कार्यक्रम में एक पौधा लगाने की परंपरा शुरू की। साथ ही सामाजिक मंचों, कार्यशालाओं और लेखों के माध्यम से आम जनता को जागरूक करता रहा हूं कि "विकास केवल इमारतें नहीं, हरियाली भी है।" मेरे गीतों, कविताओं और चित्रों में भी पर्यावरणीय संदेश समाहित रहता है।

6. पर्यावरण संरक्षण हेतु सम्मान एवं पहचान
मेरे द्वारा किए गए कार्यों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी मिली है। मुझे पर्यावरण प्रहरी सम्मान 2020,पर्यावरण प्रहरी सम्मान-2021,अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण योद्धा सम्मान 2022,अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण योद्धा सम्मान- 2023,अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण वॉरियर सम्मान 2024,राष्ट्रीय पर्यावरण एवं बालिका शिक्षा पुरस्कार-2025,इंटरनेशनल एनवायरनमेंट वॉरियर अवार्ड 2025 आदि लगभग 30 से अधिक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं, जो इस बात के प्रमाण हैं कि अगर कार्य सच्चे मन से किया जाए, तो समाज उसे सराहता भी है।

इन सम्मानों से मुझे व्यक्तिगत संतोष तो मिलता ही है, साथ ही यह जिम्मेदारी भी महसूस होती है कि मैं और अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ूं, ताकि हर गली, हर आंगन, हर विद्यालय एक हरित दिशा में कदम बढ़ा सके।

 "पेड़ लगाइए, पीढ़ियाँ बचाइए"—यही मेरा संदेश है।
— आर्टिस्ट चंद्रपाल राजभर