Tuesday, February 17, 2026

अभिलाषा मोटिवेशनल गज़ल

चलो कि फिर से नया आसमान लिखते हैं
गिरकर भी उठने का अरमान लिखते हैं।

जो छीन ले गई थी राहों की रोशनी
उस रात के खिलाफ़ सुबह का बयान लिखते हैं।

जलते रहे हैं लोग हमारी उड़ानों से
हम फिर भी हौसलों की पहचान लिखते हैं।

ठोकर ने सिखाया है संभलकर चलना
अब हर कदम पर अपना सम्मान लिखते हैं।

दुनिया अगर सवाल उठाए वजूद पर
हम कर्म से अपना ही प्रमाण लिखते हैं।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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हमने आँधियों से दोस्ती निभाई है
तभी तो हर शिखर पर जगह बनाई है।

जो पत्थर फेंकते थे राह रोकने को
उन्हीं से हमने अपनी सीढ़ी सजाई है।

कभी गिरकर भी मुस्कुराना पड़ा हमें
तभी तो ज़िंदगी ने कद बढ़ाई है।

जलन की आग में जो जल रहे हैं लोग
उन्हें क्या खबर हमने रोशनी कमाई है।

समय ने जब भी परखे हमारे इरादे,
हमने हर बार अपनी सच्चाई दिखाई है।

डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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3
हार की धूप में भी उम्मीद का साया रख
गिरकर भी उठने का खुद में हौसला रख।
दुनिया तेरी राहों में कांटे जरूर बिछाएगी
तू अपने कदमों में मंज़िल का भरोसा रख।।

वक्त तुझे परखेगा हर मोड़ पर चुपके-चुपके
तू अपने इरादों को आग सा जलाये रख।
जो आज तुझे ठुकराकर आगे निकल जाते हैं।
तू कल के लिए अपने अंदर एक सूरज जलाये रख।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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4
चलते रहो तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं
ठहरे हुए कदम अक्सर धूल में दब जाते हैं।
हौसलों की आग अगर दिल में जला लो तुम
अंधेरे भी तुम्हारे आगे सिर झुकाते हैं।।

किस्मत भी उसी के दर पर दस्तक देती है
जो मेहनत को अपना खुदा बनाते हैं।
जो हार से सीखकर फिर खड़े हो जाते हैं
वही लोग इतिहास नया लिख जाते हैं।।

टूटे हुए सपनों से घबराना मत कभी
यही सपने एक दिन ताज बन जाते हैं।
जो खुद पर भरोसा करना सीख लेते हैं
वही लोग दुनिया में पहचान बनाते हैं।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
(आर्टिस्ट)
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5
मंज़िल उन्हीं को मिलती है जो ठान लेते हैं
तूफ़ानों से लड़कर भी मुस्कान लेते हैं।
जिनके इरादों में जान होती है सच्ची
वो पत्थरों से भी रास्ते निकाल लेते हैं।

अंधेरों की औकात नहीं सूरज को रोक सके
जो खुद जलते हैं वही उजाला कर लेते हैं।
किस्मत तो एक बहाना है कमजोर लोगों का
मेहनती अपने हाथों से तक़दीर बदल लेते हैं।

रुकना नहीं चाहे रास्ता कितना भी कठिन हो
हौसले हर मुश्किल को आसान कर लेते हैं।
जो खुद पर विश्वास रखना सीख जाते हैं
वही लोग दुनिया में अपना नाम कर जाते हैं।

डॉ चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)
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6
गिरने से मत डर, गिरकर ही इंसान संभलता है
हर ठोकर के बाद ही रास्ता नया निकलता है।
जो दर्द को अपनी ताकत बना लेते हैं
वही हर मुश्किल के आगे चट्टान सा ढ़लता है।

रात जितनी गहरी हो, सुबह उतनी उजली होती है
संघर्ष की आग ही सफलता की असली ज्योति होती है।
जो हार मानकर बैठ जाते हैं राहों में
उनकी कहानी अधूरी थी और अधूरी ही रह जाती है।

तू खुद पर भरोसा रख, ये वक्त भी बदल जाएगा
तेरा आज का पसीना कल ताज बन जाएगा।
जो मेहनत से अपना मुकद्दर लिखते हैंअपना
उनके नाम से ही इतिहास बन जायेगा है।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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7
जब हौसलों की लौ दिल में जलती रहती है
तब किस्मत भी कदमों से चलती रहती है।
जब ठान लेते हैं लोग कुछ कर गुजरने की 
तो उनकी पहचान दुनिया में बनती रहती है।

मुश्किलें रोकने की लाख कोशिश करती हैं
पर मेहनत हर दीवार को तोड़ती रहती है।
जो गिरकर भी फिर खड़े होने का हुनर जानते हैं
उनकी जीत समय भी लिखती रहती है।

ये मत देख कि आज तेरे पास क्या नहीं है
ये देख कि तेरे अंदर हारने की आदत नहीं है।
जो खुद को हर दिन बेहतर बनाते रहते हैं
वही लोग इतिहास में अमर कहलाते हैं।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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8
तू खुद की तलाश में एक सफर बन जा
भीड़ में नहीं, अपनी अलग एक डगर बन जा।
जो झुक जाए मुश्किलों के आगे वो इंसान क्या
तू हौसलों की मिसाल बनकर असर बन जा।

वक्त की ठोकरें तुझे कमजोर नहीं करेंगी
यही ठोकरें तुझे एक दिन बेहतर बनायेंगी।
जो दर्द को भी मुस्कुराकर सह लेते हैं,
उनकी पहचान ही उनकी ताकत बन जायेगी।

मत रुक, अभी तेरे अंदर आग बाकी है
तेरी उड़ान के लिए खुला आसमान बाकी है।
आज भले ही कोई तेरा नाम न जानता हो
कल तेरे नाम का ही इतिहास बाकी है।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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9
खुद की नजरों में खुद को गिरने मत देना,
हालात चाहे जैसे हों, खुद को टूटने मत देना।
जो आज तुझे कमज़ोर समझकर हंसते हैं,
वो कल टूट जायेंगे मगर तुम अपने हौसलों को टूटने मत देना।

मेहनत की हर बूंद एक कहानी लिखती है
खामोशी भी एक दिन रवानी लिखती है।
जो अपने सपनों को सच मानकर जीते हैं
उनकी तक़दीर खुद उनकी निशानी लिखती है। 

डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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10

राह में कांटे मिले तो मुस्कुराकर चल दिया
मैंने अपने हौसलों से हर अंधेरा बदल दिया।
लोग कहते थे कि किस्मत साथ देती 
मैंने मेहनत से ही किस्मत को बदल दिया।

ठोकरों ने ही सिखाया है जिंदगी संभलना 
हार ने ही जीत का मतलब समझा दिया।
अब किसी तूफान से डरता नहीं हूं मैं 
मेरा विश्वास ने मुझे आसमान बना दिया।

डॉ चन्द्रपाल राजभर 

Friday, February 13, 2026

गजल मोटिवेशनल किताब

1 ठोकरें 
वक्त की ठोकरों से जो सँभलना सीख जाते हैं
वही लोग इतिहास में उजाला लिख जाते हैं।

राहें अगर कठिन हों तो मुस्कुराकर चलिए
पत्थरों के शहर में भी फूल खिल जाते हैं।

हार को मत मानिए किस्मत का आख़िरी फ़ैसला
जिनके इरादे मजबूत हों वो फिर बदल जाते हैं।
अँधेरों से घबराकर दीप नहीं बुझाया करते
साहस के दिए ही तूफ़ानों में जल जाते हैं।

वक्त भी झुक जाता है मेहनत के आगे एक दिन
जो खुद पर विश्वास रखें वो ही आगे बढ़ जाते हैं।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 

2 खामोशियां
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खामोशियों में भी एक शोर छुपा होता है
टूटे हुए दिल में भी गौर छुपा होता है।

यूँ ही नहीं मिलती पहचान इस जमाने में
हर मुस्कुराहट के पीछे दर्द छुपा होता है।

जो गिरकर संभल जाए वही असली बाज़ीगर है
हर हार के भीतर भी एक दौर छुपा होता है।

मत समझो कमजोर उसे जो चुप रहता है
उसकी सहनशीलता में ही ज़ोर छुपा होता है।

वक्त जब करवट लेता है तो सब बदल जाता है
हर अंधेरी रात में भी एक भोर छुपा होता है।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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3 सहारा
मेरे हौसलों ने हर दर्द को सहारा बना लिया
गिरते हुए ख्वाबों को भी किनारा बना लिया।

लोग पूछते रहे मेरी खामोशी का राज
मैंने हर सवाल को ही इशारा बना लिया।

तूफान डराते रहे मेरी छोटी सी कश्ती को
मैंने उसी लहर को अपना सहारा बना लिया।

जिसने ठुकराया मुझे, वही मेरी ताकत बन गया
मैंने हर ज़ख्म को ही सितारा बना लिया।

अब कोई क्या रोकेगा मेरी उड़ान को
मैंने अपने इरादों को ही पंख बना लिया।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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4 डर मत
अभी हार से मत डर, ये शुरुआत का इम्तिहान है
तेरे अंदर छुपा हुआ एक पूरा आसमान है।

ठोकरें ही सिखाती हैं चलने का असली हुनर
गिरकर संभल जाना ही इंसान की पहचान है।

राह मुश्किल सही, पर हौसला भी कम नहीं
तेरे इरादों में ही तेरी जीत का विधान है।

वक्त बदलेगा जरूर, ये याद हमेशा रखना
अंधेरों के बाद ही चमकता नया विहान है।

खुद पर विश्वास रख, तू बदल सकता है सब कुछ
तेरी मेहनत ही तेरी किस्मत का असली प्रमाण है।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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5
शिखर तक वही पहुँचते हैं जिनमें उड़ान होती है
कदम-कदम पर जिनकी हिम्मत जवान होती है।

रास्ते खुद झुक जाते हैं उनके इरादों के आगे
जिनकी सोच में जीत की पहचान होती है।

मत रुक तू मुश्किलों से डरकर ऐ मुसाफ़िर
संघर्ष में ही छुपी हर सफलता की जान होती है।

जो खुद पर विश्वास रखना सीख जाता है
उसके हाथों में ही हर नई आसमान होती है।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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6 इरादा
जो मेहनत से दोस्ती कर लेते हैं
वो किस्मत से शिकायत नहीं करते।

जो सपनों के लिए जीते हैं हर पल
वो हालातों से नहीं डरते।

अंधेरों में भी जो जलना सीख जाते हैं
वही दुनिया में रोशनी भरते हैं।

हार उन्हें छू भी नहीं सकती कभी
जो गिरकर फिर उठना सीख जाते हैं।

मंजिल खुद कदम चूमती है उनकी
जो अपने इरादों को सच मान जाते हैं।

डॉ चन्द्रपाल राजभर
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7
अपने हौसलों को कभी कमजोर मत होने देना
वक्त चाहे जैसा हो, खुद को मजबूर मत होने देना।

जो आज तुझे ठुकरा रहे हैं तेरी कमजोरियों पर
कल वही तेरी कामयाबी पर गौर करने लगेंगे।

चलते रहना तू अपने सपनों की राह पर हमेशा
रास्ते खुद तुझे मंजिल से जोड़ने लगेंगे।

तेरी मेहनत ही तेरी सबसे बड़ी पहचान बनेगी
लोग तेरे नाम से ही तुझे याद करने लगेंगे।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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8 अधूरा
अभी थका नहीं हूँ, अभी तो सफर बाकी है
मेरे इरादों में जीत का असर बाकी है।

गिरा हूँ कई बार, मग़र टूटा नहीं हूँ मैं
मेरे हौसलों में अब भी वो शजर बाकी है।

वक्त ने परखा है मुझे हर कठिन मोड़ पर
मेरे सब्र का अभी पूरा हुनर बाकी है।

जो आज हँसते हैं मेरी छोटी सी कोशिश पर
उन्हें चौंकाने को मेरा एक मुकाम बाकी है।

मैं खुद लिखूंगा अपनी सफलता की कहानी
मेरे हाथों में अभी पूरा कलम बाकी है।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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9 जीना
दीप बनकर अंधेरों में जलना सीख लिया
मैंने हर मुश्किल में संभलना सीख लिया।

लोग कहते रहे राह मुश्किल बहुत है
मैंने काँटों पर भी चलना सीख लिया।

हार ने जब भी रोकना चाहा मेरे कदम
मैंने गिरकर फिर से उठना सीख लिया।

अब कोई क्या रोकेगा मेरी मंजिल को
मैंने सपनों को हकीकत में बदलना सीख लिया।

मेरी मेहनत ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है
मैंने किस्मत से नहीं, खुद से जीतना सीख लिया।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 
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10 मंजिल 
मंजिल उन्हीं को मिलती है जो रुकना नहीं जानते
हालात कैसे भी हों, झुकना नहीं जानते।

तूफान भी सलाम करते हैं उनके इरादों को
जो डर के सामने कभी झुकना नहीं जानते।

अपने विश्वास को ताकत बना ले ऐ मुसाफ़िर
कमजोर लोग ही अक्सर खुद की पहचान नहीं जानते।

तेरी मेहनत ही तेरा सबसे बड़ा हथियार बनेगी
खाली ख्वाब कभी हकीकत में ढलना नहीं जानते।

उठ, चल, और लिख दे नई कहानी अपने जीवन की
क्योंकि किस्मत वाले नहीं, मेहनत वाले हारना नहीं जानते।
डॉ चन्द्रपाल राजभर 

Tuesday, February 10, 2026

जब जब सूरज निकलेगा प्रेरणा गीत। डॉ.चन्द्रपाल राजभर

जब जब सूरज निकलेगा,
तब तब उपवन महकेगा।
मेरी छोटी सी बगिया में,
रंग–रंग फूल खिलेगा।

अंधियारा चाहे जितना हो,
हौसलों की लौ जलानी है,
टूटी राहों से क्या डरना,
मंज़िल खुद बन जानी है।
मेहनत का दीप जलेगा,
हर सपना सच हो जाएगा।

जब जब सूरज निकलेगा,
तब तब उपवन महकेगा।
मेरी छोटी सी बगिया में,
रंग–रंग फूल खिलेगा।

माटी से ही सोना उपजे,
बीज यही विश्वास बने,
कल की चिंता छोड़ आज में,
परिश्रम ही इतिहास बने।
हर पत्ता गीत लिखेगा,
हर मौसम रंग दिखाएगा।

जब जब सूरज निकलेगा,
तब तब उपवन महकेगा।
मेरी छोटी सी बगिया में,
रंग–रंग फूल खिलेगा।

सपनों की जब उड़ान भरे,
डर की जंजीरें टूटेंगी,
सच की राह पे जो चल निकले,
किस्मत खुद ही रूठेगी।
इंसान अगर न झुकेगा,
तो जग भी शीश झुकाएगा।

जब जब सूरज निकलेगा,
तब तब उपवन महकेगा।
मेरी छोटी सी बगिया में,
रंग–रंग फूल खिलेगा।

गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

Friday, February 6, 2026

एक कलाकार जितनी कलाकृतियां बनता है वह उतनी यात्रा करता है - डॉ.चन्द्रपाल राजभर।

                 डॉ.चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

एक कलाकार जितनी कलाकृतियां बनता है वह उतनी यात्रा करता है - डॉ.चन्द्रपाल राजभर।

लघु चिंतन 
“एक कलाकार जितनी कलाकृतियाँ बनाता है, वह उतनी यात्राएँ करता है।” यह केवल एक भावात्मक कथन नहीं, बल्कि सृजन की गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक प्रक्रिया का सार है। कला स्थिर दिखाई दे सकती है, पर कलाकार कभी स्थिर नहीं होता। उसकी हर रचना उसके भीतर और बाहर की एक यात्रा का प्रमाण होती है।जब मैं किसी कैनवास के सामने खड़ा होता हूँ, तो वह केवल रंगों का खाली विस्तार नहीं होता; वह मेरे भीतर के प्रश्नों, अनुभवों, स्मृतियों और संघर्षों का खुला आकाश होता है। पहली रेखा खींचते ही एक यात्रा आरम्भ हो जाती है—विचार से आकार तक, आकार से भाव तक और भाव से समाज तक। यह यात्रा केवल हाथ की नहीं, मन की भी होती है। मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य अपने अवचेतन अनुभवों को अभिव्यक्ति के माध्यम से मुक्त करता है। कलाकार की हर कृति उसके अवचेतन का एक पड़ाव है।यदि कोई कलाकार प्रकृति का चित्र बनाता है, तो वह केवल पेड़-पौधों का चित्रण नहीं कर रहा होता; वह अपने भीतर की हरियाली, शांति और संतुलन की तलाश कर रहा होता है। जब मैंने ‘प्रकृतिक चित्रण’ और ‘चाँद चिंतन’ श्रृंखला पर कार्य किया, तो वह बाहरी दृश्य भर नहीं थे; वे मेरे भीतर चल रहे संवाद की अभिव्यक्ति थे। समाज में वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण चेतना के लिए जो बेचैनी थी, वह रंगों के माध्यम से बाहर आई। यह एक सामाजिक यात्रा भी थी—स्वयं से समाज तक।मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हर कलाकृति कलाकार के व्यक्तित्व के विकास का एक चरण होती है। एक बच्चा जब पहली बार चित्र बनाता है, तो वह रेखाओं में अपनी पहचान खोजता है। उसी प्रकार परिपक्व कलाकार अपनी हर रचना में अपने अनुभवों को पुनः जीता है। यह आत्म-परिष्कार की प्रक्रिया है। जैसे साधक हर जप के साथ भीतर गहराई में उतरता है, वैसे ही कलाकार हर कृति के साथ आत्मा की नई परत खोलता है।तार्किक रूप से भी देखें तो एक कलाकार जितनी विविध विषयों पर कार्य करता है, उतना ही उसका दृष्टिकोण व्यापक होता जाता है। यदि वह ‘वेदना’ पर चित्र बनाता है, तो उसे पीड़ा को समझना पड़ता है; यदि वह ‘पुष्प’ बनाता है, तो उसे कोमलता और सौंदर्य को आत्मसात करना पड़ता है। इस प्रकार हर विषय एक नई मानसिक और भावनात्मक यात्रा है। यह यात्राएँ भौगोलिक नहीं, बल्कि अनुभवात्मक होती हैं।समाज में भी हम देखते हैं कि जो कलाकार अधिक सृजनशील होता है, वह अधिक संवेदनशील होता है। संवेदनशीलता ही यात्रा का आधार है। बिना संवेदना के न कला संभव है, न यात्रा। जब कोई चित्रकार किसी किसान की थकी आँखों को उकेरता है, तो वह खेतों तक गया हो या न गया हो, पर उसकी आत्मा उस श्रम और संघर्ष की भूमि पर अवश्य गई होती है। यही कला की अदृश्य यात्रा है।मेरे लिए हर कलाकृति एक दर्पण है, जिसमें मैं स्वयं को नए रूप में देखता हूँ। कभी वह दर्पण मुझे मेरी सीमाएँ दिखाता है, कभी मेरी संभावनाएँ। असफल चित्र भी एक यात्रा है, क्योंकि वह मुझे सिखाता है कि अगली बार कौन-सा मार्ग अपनाना है। सफलता और असफलता दोनों ही पड़ाव हैं, और कलाकार का जीवन इन्हीं पड़ावों की श्रृंखला है।इसलिए मैं मानता हूँ कि कलाकार की सृजन-यात्रा अनवरत है। जितनी अधिक कलाकृतियाँ, उतनी अधिक आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक यात्राएँ। कला केवल दीवारों पर टंगी वस्तु नहीं, वह कलाकार की जीवित यात्रा का दस्तावेज है।

डॉ. चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)
लेखक- SWA MUMBAI

Sunday, January 18, 2026

स्वार्थ में दुनिया अंधी है डॉ.चन्द्रपाल राजभर

स्वार्थ में दुनिया आंधी है
सच की ऐसी तैसी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियों की ये धरती है

लाभ-लालच मा बंधि गइनी, नाता-रिश्ता टूट गवा
पइसा खातिर धरम बिकात, माटी रोवे लूट गवा।
झूठे वचनन की भरमार, सचवा रोवे सिसकइ है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

महँगी हंसी, सस्ता आँसू, बिकात इज्जत रोज अइ
मेहनतिया के हक छीन लिहिन, साहूकारन मौज अइ।
न्याय-धरम सब ठेंगा भए, गद्दी पइ बस कुर्सी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

खेती उजड़ी, मजूर हारे, शहरन लूटत गाँव अइ
सोने जइसन सपना बेंचि, जागे भूख अकाल अइ।
बोलत नाहीं अब विवेक, जुबान गिरवी धरती है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

रचना 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

Monday, December 22, 2025

पुस्तक- मोटिवेशनल गजल

1
हौसला
हौसलों की लौ अगर दिल में जली रहती है
हर अँधेरी रात फिर खुद ही ढली रहती है।

हार मानो मत कभी हालात के तूफ़ानों से
जिद्द की एक नाव अक्सर पार चली रहती है।

जो गिरा है वही उठने का हुनर जानता है
चोट खाकर ही तो तक़दीर पली रहती है।

ख़्वाब सच होते हैं बस कोशिशों के साए में
नींद आराम की मेहनत से छली रहती है।

भीड़ में खोना बहुत आसान है ऐ मेरे दोस्त
अपनी पहचान मगर अलग बनी रहती है।

वक्त देता है परीक्षा, हौसला देता है फल
सब्र की राह हमेशा ही भली रहती है।

जो न झुकता है कभी झूठे तक़ाज़ों के आगे
उसकी पेशानी सदा ऊँची ढली रहती है।
गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

2
मंजिल 
चल पड़ा जो अपने दम पर, वही मंज़िल पाएगा
भीड़ के पीछे चला तो नाम खो जाएगा।

टूटकर बिखरना भी एक सबक सिखा जाता है
जो संभल गया वही आगे दूर तक जाएगा।

ख़ौफ़ की दीवार ऊँची सिर्फ़ नज़र आती है
हौसलों का क़दम बढ़े तो गिर ही जाएगा।

आज जो चुप है वही कल बोलता इतिहास में
सब्र का हर एक लम्हा रंग लाएगा।

हार के शोर में मत अपनी आवाज़ खो,
सच का साया देर से ही सही छा जाएगा।

थक के रुकना भी बुरा नहीं सफ़र में मगर
रुक के बैठा जो हमेशा पीछे रह जाएगा।

जो जला है खुद उजाला बाँटने की चाह में
वक़्त उसका नाम सूरज सा बताएगा।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
-------------
3
इरादा
अब झुकेंगे नहीं हम, यह इरादा लिख दिया है,
डर के माथे पर भी सच का क़ायदा लिख दिया है।

जो सहे सदियों की चुप्पी, वो भी बोले आज फिर से,
ख़ामोशी के ख़िलाफ़ हमने नारा लिख दिया है।

बेड़ियाँ टूटी नहीं तो सोच को आज़ाद कर दिया,
जेल की दीवार पर भी रास्ता लिख दिया है।

भूख ने सिखला दिया है इंक़लाब का सबक़,
सूखी रोटी ने लहू में फ़लसफ़ा लिख दिया है।

जो हुकूमत ने कहा था “मत उठाना सिर कभी”,
उसी सिर ने आज हर एक फ़ैसला लिख दिया है।

हम नहीं माँगेंगे हक़, अब छीनना सीखा है,
मुट्ठियों ने वक्त का नक़्शा नया लिख दिया है।

जो जले अँधेरों में बनकर मशाल-ए-राह,
उस शहीद ने हर नस में हौसला लिख दिया है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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4
ख़ामोश हथियार 
हमने ख़ामोशी को भी अब हथियार बना लिया,
चुप्पियों में ही बग़ावत का इज़हार कर लिया।

जो लुटाते थे सदा सपने हमारे नाम पर,
हमने उनकी नींद पर पहरा तैनात कर लिया।

भूख की भाषा समझ आई तो जाना यह भी सच,
पेट ने संसद से भी ऊँचा इन्क़लाब कर लिया।

अब किताबें सिर्फ़ अलमारी की शोभा नहीं है,
हर हर्फ़ ने ख़ुद को मशाल-ए-राह कर लिया।

जो कहे “सब ठीक है” उस झूठ से समझौता नहीं है,
हमने सच बोलने का ख़तरा स्वीकार कर लिया।

कायरों की भीड़ से रिश्ता हमारा टूट गया ,
डर को पैरों तले रौंद कर इतिहास लिख लिया।

आज जो सड़कों पे है, कल वही संविधान है,
जन ने ख़ुद को पहली बार सरकार लिख लिया।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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5
स्याही 
मैं स्याही में लहू मिलाकर सच लिख रहा हूँ,
डर की सलाख़ों पर भी आवाज़ लिख रहा हूँ।

जो बिक गई थीं सदियों से ज़मीरे सत्ता में,
उनके मुक़ाबिल नया इंसान लिख रहा हूँ।

यह जो अख़बारों में सजा झूठ का मेला है,
उस हर झूठ के सामने विद्रोह लिख रहा हूँ।

मेहनतकश के हाथ की रेखा मिटा दी गई,
उसी हथेली पर नया इतिहास लिख रहा हूँ।

मत पूछो मुझसे अदब, नर्मी, तहज़ीब अभी,
वक़्त के काग़ज़ पे मैं इन्क़लाब लिख रहा हूँ।

जो कह रहे थे “कल लिखना”, “अभी नहीं बोलो”,
उसी आज में मैं हर एक सवाल लिख रहा हूँ।

यह ग़ज़ल नहीं, यह गवाही है दौर की,
मैं अपने हिस्से का पूरा जवाब लिख रहा हूँ।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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6
प्रश्न आसान नहीं थे, फिर भी सच लिख आया हूँ
आंसर शीट पर मैं अपना वजूद लिख आया हूँ।

जो सिखाया गया था चुप रहो, वही काट दिया
गलत सवालों के आगे विद्रोह लिख आया हूँ।

नंबर काटे गए तो क्या, डर पास हो गया
मैं हर एक उत्तर में हौसला लिख आया हूँ।

सिलेबस में नहीं था जो, वही सबसे ज़रूरी था
मैं जीवन का पूरा अनुभव लिख आया हूँ।

काट दी जाएगी शायद यह कापी जाँच में
फिर भी हर पन्ने पे इन्क़लाब लिख आया हूँ।

जो कह रहे थे “लिखना मत, यही समझदारी है
उनकी समझ के बाहर जवाब लिख आया हूँ।

यह परीक्षा सिर्फ़ नौकरी की नहीं थी दोस्त
मैं आदमी हूँ—यह पहचान लिख आया हूँ।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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7
वक्त 
वक्त रुकता नहीं, मगर राह दिखा जाता है
जो संभल जाए वही आगे निकल जाता है।

आज जो बीज पसीने से ज़मीं में बोया है
वक्त उस बीज को कल पेड़ बना जाता है।

हार पल भर की होती है अगर दिल न थके
वक्त ठहरे हुए पत्थर भी हिला जाता है।

जो अभी टूट के बैठा है, उसे क्या मालूम
वक्त गिरकर भी इंसान को उठा जाता है।

कल पे टालो मत अभी जो भी ज़रूरी है यहाँ
वक्त हर काम का अंजाम बता जाता है।

जो समय की क़द्र करता है वही जीतता है
वक्त लापरवाह को पीछे छोड़ जाता है।

आज चुपचाप जो मेहनत में लगा रहता है
वक्त कल उसका ही सिक्का चला जाता है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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8
जरूरी है 
हर बात में जीत नहीं, हार भी ज़रूरी है
ज़िंदगी समझने को ठोकर भी ज़रूरी है।

कहने से कुछ नहीं होता, करना ही पड़ता है
ख़्वाबों के सच होने को मेहनत ज़रूरी है।

जो आज थक कर बैठ गया, वो कल रोएगा
थोड़ा सा चलते रहना हर दिन ज़रूरी है।

लोगों की बातों में मत अपना वक़्त गँवाओ
ख़ुद की निगाह में इज़्ज़त ज़रूरी है।

सबका साथ मिले, ये मुमकिन नहीं यहाँ
ख़ुद पर भरोसा रखना सबसे ज़रूरी है।

जल्दी में फैसले अकसर गलत निकलते हैं
कुछ बातों में ठहरना भी ज़रूरी है।

ज़िंदगी आसान नहीं, पर नामुमकिन भी नहीं
बस रोज़ थोड़ा बेहतर होना ज़रूरी है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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9
किताब 
हर किताब सिर्फ़ काग़ज़ की कहानी नहीं होती
कुछ किताबें ज़िंदगी जीना सिखा देती हैं।

जो सवाल मन में दबे रहते हैं बरसों तक
एक सच्ची किताब उन्हें बोलना सिखा देती है।

अकेलेपन में जब कोई साथ नहीं देता
तब किताब ही इंसान को सहारा देती है।

जो ठोकरों से थक कर रुक गया था राह में
किताब उसे फिर से खड़ा होना सिखा देती है।

हर पन्ना कहता है—रुक मत, आगे बढ़
किताब हार के आगे झुकना मना कर देती है।

डिग्रियाँ नहीं, सोच बदलती है असल में
किताब आदमी को आदमी बना देती है।

जो रोज़ थोड़ा पढ़ता है, थोड़ा समझता है
वही किताब एक दिन मुक़द्दर लिखा देती है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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10
कदम
पहला क़दम ही अक्सर सबसे भारी होता है
चल पड़े तो रास्ता खुद ही सहारा होता है।

रुक के सोचना ठीक है, डर के बैठना नहीं
हर सफ़र एक छोटे क़दम से ही शुरू होता है।

जो आज एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाता
कल वही अपनी जगह पर ही ठहरा होता है।

क़दमों की आवाज़ से डरता है अँधेरा भी
चलने वाला आदमी कभी अकेला होता है?

धीरे चल, मगर रुक मत—यही उसूल रख
क़दम थमे तो सपना भी अधूरा होता है।

हर रोज़ एक क़दम ईमानदारी से बढ़ाओ
यही आदत एक दिन बड़ा मुक़द्दर होता है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

Sunday, December 21, 2025

तुम्हारी नजरें कुछ कह जाती हैं -गीत

तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,
बिन छुए ही जो दिल को छू जाए,
वो हर धड़कन मेरी बन जाती हैं।

होठों की लकीरों में छुपी बातों को,
आँखों की चमक यूँ उजागर करती है,
एक मुस्कान की हल्की सी बारिश,
रूह के आँगन को तर करती है।
सांसों में घुली जो खुशबू तुम्हारी,
हर लम्हा नया एहसास जगाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

पलकों का झुकना, फिर नज़र उठना,
कह जाता है जो लफ्ज़ न कह पाए,
एक नज़र में सौ वादे लिखकर,
सीधे दिल के पन्ने पर उतर जाए।
नज़रों का ये जादू संभाले न संभले,
नीयत भी राहें बदल जाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

उल्फत की गलियों में जो कदम रखा,
एक धड़कन वहीं ठहर सी गई,
तुम्हारी आँखों में जो घर पाया,
मेरी हर तन्हाई बिखर सी गई।
सीने में जो धड़कन आज भी धड़के,
वो तुम्हारी धड़कन कहलाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं

गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

Friday, December 19, 2025

स्कूल गीत

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

मेहनत करबा ता ,मेहनतिया बोली होss, 
चमक उठी तोहर,किस्मतिया बोली हो।।
गाँव नगरिया से निकाला पाऊंवा हो, ।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

झोलवा औ, कंपनियां , कितबिया लेला हो।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

गरीबी के दीवार ई ,गिरेगी हिम्मत से
होला सपनवा ,साकार मेहनत से
 
इल्मों का दीप जरेला हिम्मत से, 
अंधियारा दूर भगवा, तू पढ़ी ला मेहनत से

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

जिंनगी तोहार औ, दुआर सुधर जाई
पढ़ी-लिखी लेबा तो परिवार सुधर जाए 
गांव समाज के सम्मान बढ़ जाए
देशवा के अपने, मान बढ़ी जाई
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।।।

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

गीत 
डॉक्टर चन्द्रपाल राजभर

Wednesday, November 19, 2025

प्रेम हमेशा एक तरफा होता है -डॉ.चन्द्रपाल राजभर का एक चिंतन

प्रेम अक्सर एकतरफा ही होता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय देने की क्षमता रखता है, लेकिन पाने की अपेक्षा से भरा होता है। मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेम एक ऐसी ऊर्जा है जो प्रवाह चाहती है—यह रोका जाए तो दुख देती है, और बहने दिया जाए तो शक्ति बन जाती है। समस्या यह नहीं कि प्रेम एकतरफा है; समस्या यह है कि हम प्रेम को दो-तरफा सौदे की तरह देखना चाहते हैं। जबकि प्रेम का स्वभाव ही एकतरफा है—पहले देना, फिर स्वीकारना।

मनुष्य जब किसी से प्रेम करता है, तो वह प्रेम उसके भीतर की संवेदनाओं, अनुभवों और स्मृतियों से जन्म लेता है। दूसरे व्यक्ति का उस प्रेम को समझना या न समझना अक्सर संयोग होता है। जैसे एक चित्रकार कैनवास पर रंग भरता है—वह रंग उसकी अपनी आत्मा से आते हैं, दर्शक उनसे जुड़े या न जुड़ें, उस सृजन की शक्ति को कम नहीं कर सकते। प्रेम भी ठीक ऐसा ही है—वह अपने प्रदर्शन के लिए दूसरे की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता।

उदाहरण के लिए, एक युवक अपनी सहकर्मी को बहुत सम्मान और स्नेह देता है। वह उसके हर संघर्ष को समझता है, उसकी हर सफलता पर गर्व महसूस करता है, लेकिन वह सहकर्मी इस भावना से अनजान रहती है। बहुत समय बाद जब उसे पता चलता है, वह कहती है—“मैंने कभी इस प्रकार नहीं सोचा।” यह कथन एकतरफा प्रेम की सच्चाई को बताता है। युवक का प्रेम उस स्वीकृति पर आधारित नहीं था; वह उसके हृदय की प्राकृतिक प्रतिक्रिया थी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह एक स्वस्थ प्रेम है, क्योंकि इसमें अधिकार नहीं, केवल अनुभव है।

एकतरफा प्रेम दुख नहीं देता; अपेक्षा देती है। जब हम प्रेम को लौटाने की चाह छोड़ देते हैं, तब प्रेम हमारे भीतर एक शक्ति बन जाता है। यह मन को परिपक्व करता है, संवेदनशील बनाता है और मनुष्य को भीतर से गहराई देता है। कई बार एकतरफा प्रेम व्यक्ति को इतना मजबूत बना देता है कि वह अपनी प्रतिभा, कला और जीवन में अद्भुत उन्नति कर लेता है, क्योंकि अस्वीकार से नहीं, बल्कि भावनाओं की तीव्रता से ऊर्जा उत्पन्न होती है।

सच तो यह है कि प्रेम दो तरफा तभी होता है जब दो दिलों की दिशाएं संयोगवश एक जैसी हों। लेकिन प्रेम शुरू हमेशा एकतरफा होता है—पहले एक दिल धड़कता है, फिर दूसरा जागता है। इसलिए एकतरफा प्रेम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे पवित्र क्षमता है—निःस्वार्थ होकर महसूस करना, समझना और किसी के लिए शुभकामना करना। यही प्रेम को महान बनाता है, और यही उसे अनंत बनाता है। और एक समय ऐसा आता है दोनों मिलकर फिर एक हो जाते हैं और प्रेम फिर एक ही हो जाता है यानी कि एक तरफा 

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
 (आर्टिस्ट )

Tuesday, November 18, 2025

चित्रकारिता से लोग दूरियां बना रहे हैं- डॉ.चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट का एक चिंतन

आज लोग चित्रकारिता से दूरियां इसलिए बना रहे हैं क्योंकि उनका मन कला की गहराई को समझने से पहले ही बाज़ार और लाभ-हानि की भाषा में उलझ जाता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है कि मनुष्य उस काम से बचता है, जिसमें तुरंत परिणाम दिखाई न दे। लेकिन कला—विशेषकर चित्रकला—एक ऐसा साधन है जहाँ फल से पहले अभ्यास, अनुशासन, धैर्य और आत्मसंवाद की लंबी यात्रा होती है। आज की तेजी से भागती दुनिया में लोग इस यात्रा को बोझ समझ लेते हैं।चित्रकला सिर्फ कागज़ पर रंग भरना नहीं है, बल्कि मन की परतों को खोलना है। बच्चा जब पहली बार रेखाएँ बनाता है तो वह रेखाएँ उसके अंतर्मन का आईना होती हैं। परंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसकी तुलना शुरू कर देता है—"इससे अच्छा तो फलाँ बनाता है", "कला में करियर नहीं बनता", "सिविल, बैंक या कंप्यूटर सीखो"। यह नकारात्मक तुलना धीरे-धीरे उसकी सृजनात्मकता को डरा देती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, भय और संकोच वह दो दीवारें हैं जो किसी भी कलाकार की उड़ान रोक देती हैं।उदाहरण के लिए, एक छात्र जिसने कक्षा 6 में कमाल की पेंटिंग बनाई थी, उसने 10वीं में आते-आते रंग उठाना तक बंद कर दिया। कारण पूछा गया तो बोला—“सर, लोग कहते हैं कला से कुछ बनता नहीं।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं होते, यह व्यक्ति की आत्म-धारणा पर चोट करते हैं। कला छोड़ देने की शुरुआत यहीं से होती है।दरअसल, कला कमाने से पहले कमल की तरह खिलना सिखाती है। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग रखता है, तो वह सिर्फ दृश्य नहीं बनाता बल्कि अपना मन साफ करता है, तनाव कम करता है और भावनाओं को स्वस्थ दिशा देता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से कला से जुड़ा होता है, वह मानसिक रूप से अधिक स्थिर, अधिक संवेदनशील और अधिक रचनात्मक होता है।समस्या कला में नहीं, हमारी सोच में है। लोग यह समझ नहीं पाते कि चित्रकला जीवन को सिर्फ सुंदर नहीं बनाती, बल्कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है। जिस दिन समाज यह महसूस कर लेगा कि कलाकार बनने का अर्थ सिर्फ पेंटिंग बेचना नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ना है, उस दिन चित्रकारिता से दूरियां नहीं, नजदीकियां बढ़ेंगी।चित्रकला मनुष्य को वह सिखाती है जो कोई पुस्तक नहीं सिखाती—धैर्य, संतुलन, गहराई, और जीवन के रंगों का वास्तविक अर्थ। इसलिए मेरा मानना है कि लोग चित्रकारिता से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें फिर से रंगों की भाषा सिखाने की जरूरत है। जब उन्हें यह एहसास होगा कि कला सिर्फ कैरियर नहीं, एक मनोवैज्ञानिक उपचार है, तब चित्रकारिता फिर से घर-घर में जन्म लेगी।

Monday, November 10, 2025

विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है-डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन


(विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है)डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन

इंसान का जाना एक भौतिक घटना है — शरीर की उपस्थिति का अंत या दूरी — लेकिन उसकी बेवफाई एक मानसिक घटना है, जो चेतन और अवचेतन मन दोनों में गहरी छाप छोड़ जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इंसान की स्मृतियाँ केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उन घटनाओं से जुड़े भावनात्मक अनुभवों से निर्मित होती हैं।जब कोई हमें धोखा देता है, तो मस्तिष्क में एमिग्डाला (amygdala) नामक भाग सक्रिय हो जाता है, जो भय, दर्द और असुरक्षा जैसी भावनाओं को लंबे समय तक संचित रखता है। इसीलिए शरीर तो भूल जाता है, पर मन नहीं। यह मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है कि सकारात्मक भावनाएँ जल्दी मिट जाती हैं, जबकि नकारात्मक अनुभव लंबे समय तक स्मृति में स्थिर रहते हैं।
दरअसल, बेवफाई केवल किसी व्यक्ति से विश्वासघात नहीं होती, बल्कि यह हमारे स्व-मूल्यांकन पर भी प्रहार करती है। व्यक्ति सोचता है कि “मैं इतना गलत क्यों था कि धोखा खा गया?” — और यही प्रश्न उसकी चेतना को बार-बार कुरेदता रहता है। यही कारण है कि इंसान चला जाए तो शरीर अनुपस्थित हो जाता है, लेकिन उसकी बेवफाई “अनुभव” बनकर मन के भीतर जीवित रहती है।मनोविज्ञान कहता है कि जब हम किसी से गहरा जुड़ाव बनाते हैं, तो मस्तिष्क में “ऑक्सीटोसिन” और “डोपामिन” जैसे रासायनिक हार्मोन उत्पन्न होते हैं, जो आनंद और विश्वास का संकेत देते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति बेवफाई करता है, तो वही रासायनिक तंत्र ध्वस्त हो जाता है — और मस्तिष्क को यह झटका लंबे समय तक भावनात्मक दर्द के रूप में महसूस होता है।इसलिए, यह कहना एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है कि —
“इंसान चला जाता है, मगर उसकी बेवफाई याद रहती है,”
क्योंकि शरीर की दूरी से अधिक विश्वास का टूटना दर्द देता है। समय बीतता है, लोग बदलते हैं, लेकिन बेवफाई की स्मृति हमारे आत्म-सम्मान की दरारों में हमेशा गूंजती रहती है — जब तक व्यक्ति उसे क्षमा या स्वीकृति के माध्यम से पार नहीं कर लेता। यह अनुभव हमें सिखाता है कि हर विदाई हानि नहीं होती, कुछ विदाइयाँ स्वयं की पहचान का आरंभ होती हैं।

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
(चित्रकार, चिंतक एवं मनोवैज्ञानिक लेखक)

Monday, October 27, 2025

गीत आभा दिखा दे चन्दा - डॉ चन्द्रपाल राजभर

रात बड़ी लम्बी, आनन दिखा दे चन्दा,
नींद नहीं आती, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा १ :
सपनों के सागर में कोई किनारा नहीं,
यादों की लहरों का अब उतारा नहीं,
दिल की बुझी लौ को, फिर से जला दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा २ :
चुपके से कोई दर्द दिल में उतरता है,
आँखों के आँगन में आँसू ठहरता है,
थोड़ी सी राहत की छाया बना दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ३ :
तनहा ये दिल रातों में तड़पता बहुत है,
सपनों की दुनिया में भटकता बहुत है,
सुकून का कोई लम्हा सजा दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ४ :
दूर कहीं वो चेहरे की झलक सोई है,
तेरी किरणों में उसकी झलक खोई है,
उस याद की परछाईं दिखा दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

अंतरा ५ (समापन):
मन की व्यथा अब गीतों में ढल जाती है,
हर धड़कन तेरे नाम पे चल जाती है,
रात का सन्नाटा महका दे चन्दा,
नींद नहीं लागे, आभा दिखा दे चन्दा ।।

Monday, October 20, 2025

पवन गीत- लेखक डॉ चन्द्रपाल राजभर

पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।
फूलों से खुशबू अब बरसे,
मन में उठे मीठी बरसात॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

बादल छाए, नभ मुस्काए,
जाने कहाँ तू खोई जाए।
तेरी हँसी का झोंका आए,
मन में मेरे उल्लास जगाये।।
पवन बोले जब, प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

सावन में गाए, साजन तेरे,
झरनों में बहें ,अरमान मेरे।
सपनों में तेरा ,नाम पुकारे,
प्रीत की अलख, फिर जगाये॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।

चाँद सा गोरा मुखड़ा तेरा,
पवन करे अब तेरा पहरा।
साँसों में तेरी खुशबू ठहरे,
मन को मिले तेरी सौगात॥
पवन बोले जब प्यारी बात,
दिलाए तेरी मेरी फिर याद।
फूलों से खुशबू अब बरसे,
मन में उठे मीठी बरसात॥

लेखक 
डॉ चन्द्रपाल राजभर