Sunday, January 18, 2026

स्वार्थ में दुनिया अंधी है डॉ.चन्द्रपाल राजभर

स्वार्थ में दुनिया आंधी है
सच की ऐसी तैसी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियों की ये धरती है

लाभ-लालच मा बंधि गइनी, नाता-रिश्ता टूट गवा
पइसा खातिर धरम बिकात, माटी रोवे लूट गवा।
झूठे वचनन की भरमार, सचवा रोवे सिसकइ है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

महँगी हंसी, सस्ता आँसू, बिकात इज्जत रोज अइ
मेहनतिया के हक छीन लिहिन, साहूकारन मौज अइ।
न्याय-धरम सब ठेंगा भए, गद्दी पइ बस कुर्सी है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

खेती उजड़ी, मजूर हारे, शहरन लूटत गाँव अइ
सोने जइसन सपना बेंचि, जागे भूख अकाल अइ।
बोलत नाहीं अब विवेक, जुबान गिरवी धरती है
का कही तोहै अब ए बबुआ
पूंजीवादियन की धरती है।

रचना 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

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