मनुष्य जब किसी से प्रेम करता है, तो वह प्रेम उसके भीतर की संवेदनाओं, अनुभवों और स्मृतियों से जन्म लेता है। दूसरे व्यक्ति का उस प्रेम को समझना या न समझना अक्सर संयोग होता है। जैसे एक चित्रकार कैनवास पर रंग भरता है—वह रंग उसकी अपनी आत्मा से आते हैं, दर्शक उनसे जुड़े या न जुड़ें, उस सृजन की शक्ति को कम नहीं कर सकते। प्रेम भी ठीक ऐसा ही है—वह अपने प्रदर्शन के लिए दूसरे की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता।
उदाहरण के लिए, एक युवक अपनी सहकर्मी को बहुत सम्मान और स्नेह देता है। वह उसके हर संघर्ष को समझता है, उसकी हर सफलता पर गर्व महसूस करता है, लेकिन वह सहकर्मी इस भावना से अनजान रहती है। बहुत समय बाद जब उसे पता चलता है, वह कहती है—“मैंने कभी इस प्रकार नहीं सोचा।” यह कथन एकतरफा प्रेम की सच्चाई को बताता है। युवक का प्रेम उस स्वीकृति पर आधारित नहीं था; वह उसके हृदय की प्राकृतिक प्रतिक्रिया थी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह एक स्वस्थ प्रेम है, क्योंकि इसमें अधिकार नहीं, केवल अनुभव है।
एकतरफा प्रेम दुख नहीं देता; अपेक्षा देती है। जब हम प्रेम को लौटाने की चाह छोड़ देते हैं, तब प्रेम हमारे भीतर एक शक्ति बन जाता है। यह मन को परिपक्व करता है, संवेदनशील बनाता है और मनुष्य को भीतर से गहराई देता है। कई बार एकतरफा प्रेम व्यक्ति को इतना मजबूत बना देता है कि वह अपनी प्रतिभा, कला और जीवन में अद्भुत उन्नति कर लेता है, क्योंकि अस्वीकार से नहीं, बल्कि भावनाओं की तीव्रता से ऊर्जा उत्पन्न होती है।
सच तो यह है कि प्रेम दो तरफा तभी होता है जब दो दिलों की दिशाएं संयोगवश एक जैसी हों। लेकिन प्रेम शुरू हमेशा एकतरफा होता है—पहले एक दिल धड़कता है, फिर दूसरा जागता है। इसलिए एकतरफा प्रेम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे पवित्र क्षमता है—निःस्वार्थ होकर महसूस करना, समझना और किसी के लिए शुभकामना करना। यही प्रेम को महान बनाता है, और यही उसे अनंत बनाता है। और एक समय ऐसा आता है दोनों मिलकर फिर एक हो जाते हैं और प्रेम फिर एक ही हो जाता है यानी कि एक तरफा
डॉ. चन्द्रपाल राजभर
(आर्टिस्ट )