Wednesday, November 19, 2025

प्रेम हमेशा एक तरफा होता है -डॉ.चन्द्रपाल राजभर का एक चिंतन

प्रेम अक्सर एकतरफा ही होता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय देने की क्षमता रखता है, लेकिन पाने की अपेक्षा से भरा होता है। मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेम एक ऐसी ऊर्जा है जो प्रवाह चाहती है—यह रोका जाए तो दुख देती है, और बहने दिया जाए तो शक्ति बन जाती है। समस्या यह नहीं कि प्रेम एकतरफा है; समस्या यह है कि हम प्रेम को दो-तरफा सौदे की तरह देखना चाहते हैं। जबकि प्रेम का स्वभाव ही एकतरफा है—पहले देना, फिर स्वीकारना।

मनुष्य जब किसी से प्रेम करता है, तो वह प्रेम उसके भीतर की संवेदनाओं, अनुभवों और स्मृतियों से जन्म लेता है। दूसरे व्यक्ति का उस प्रेम को समझना या न समझना अक्सर संयोग होता है। जैसे एक चित्रकार कैनवास पर रंग भरता है—वह रंग उसकी अपनी आत्मा से आते हैं, दर्शक उनसे जुड़े या न जुड़ें, उस सृजन की शक्ति को कम नहीं कर सकते। प्रेम भी ठीक ऐसा ही है—वह अपने प्रदर्शन के लिए दूसरे की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता।

उदाहरण के लिए, एक युवक अपनी सहकर्मी को बहुत सम्मान और स्नेह देता है। वह उसके हर संघर्ष को समझता है, उसकी हर सफलता पर गर्व महसूस करता है, लेकिन वह सहकर्मी इस भावना से अनजान रहती है। बहुत समय बाद जब उसे पता चलता है, वह कहती है—“मैंने कभी इस प्रकार नहीं सोचा।” यह कथन एकतरफा प्रेम की सच्चाई को बताता है। युवक का प्रेम उस स्वीकृति पर आधारित नहीं था; वह उसके हृदय की प्राकृतिक प्रतिक्रिया थी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह एक स्वस्थ प्रेम है, क्योंकि इसमें अधिकार नहीं, केवल अनुभव है।

एकतरफा प्रेम दुख नहीं देता; अपेक्षा देती है। जब हम प्रेम को लौटाने की चाह छोड़ देते हैं, तब प्रेम हमारे भीतर एक शक्ति बन जाता है। यह मन को परिपक्व करता है, संवेदनशील बनाता है और मनुष्य को भीतर से गहराई देता है। कई बार एकतरफा प्रेम व्यक्ति को इतना मजबूत बना देता है कि वह अपनी प्रतिभा, कला और जीवन में अद्भुत उन्नति कर लेता है, क्योंकि अस्वीकार से नहीं, बल्कि भावनाओं की तीव्रता से ऊर्जा उत्पन्न होती है।

सच तो यह है कि प्रेम दो तरफा तभी होता है जब दो दिलों की दिशाएं संयोगवश एक जैसी हों। लेकिन प्रेम शुरू हमेशा एकतरफा होता है—पहले एक दिल धड़कता है, फिर दूसरा जागता है। इसलिए एकतरफा प्रेम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे पवित्र क्षमता है—निःस्वार्थ होकर महसूस करना, समझना और किसी के लिए शुभकामना करना। यही प्रेम को महान बनाता है, और यही उसे अनंत बनाता है। और एक समय ऐसा आता है दोनों मिलकर फिर एक हो जाते हैं और प्रेम फिर एक ही हो जाता है यानी कि एक तरफा 

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
 (आर्टिस्ट )

Tuesday, November 18, 2025

चित्रकारिता से लोग दूरियां बना रहे हैं- डॉ.चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट का एक चिंतन

आज लोग चित्रकारिता से दूरियां इसलिए बना रहे हैं क्योंकि उनका मन कला की गहराई को समझने से पहले ही बाज़ार और लाभ-हानि की भाषा में उलझ जाता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है कि मनुष्य उस काम से बचता है, जिसमें तुरंत परिणाम दिखाई न दे। लेकिन कला—विशेषकर चित्रकला—एक ऐसा साधन है जहाँ फल से पहले अभ्यास, अनुशासन, धैर्य और आत्मसंवाद की लंबी यात्रा होती है। आज की तेजी से भागती दुनिया में लोग इस यात्रा को बोझ समझ लेते हैं।चित्रकला सिर्फ कागज़ पर रंग भरना नहीं है, बल्कि मन की परतों को खोलना है। बच्चा जब पहली बार रेखाएँ बनाता है तो वह रेखाएँ उसके अंतर्मन का आईना होती हैं। परंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसकी तुलना शुरू कर देता है—"इससे अच्छा तो फलाँ बनाता है", "कला में करियर नहीं बनता", "सिविल, बैंक या कंप्यूटर सीखो"। यह नकारात्मक तुलना धीरे-धीरे उसकी सृजनात्मकता को डरा देती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, भय और संकोच वह दो दीवारें हैं जो किसी भी कलाकार की उड़ान रोक देती हैं।उदाहरण के लिए, एक छात्र जिसने कक्षा 6 में कमाल की पेंटिंग बनाई थी, उसने 10वीं में आते-आते रंग उठाना तक बंद कर दिया। कारण पूछा गया तो बोला—“सर, लोग कहते हैं कला से कुछ बनता नहीं।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं होते, यह व्यक्ति की आत्म-धारणा पर चोट करते हैं। कला छोड़ देने की शुरुआत यहीं से होती है।दरअसल, कला कमाने से पहले कमल की तरह खिलना सिखाती है। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग रखता है, तो वह सिर्फ दृश्य नहीं बनाता बल्कि अपना मन साफ करता है, तनाव कम करता है और भावनाओं को स्वस्थ दिशा देता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से कला से जुड़ा होता है, वह मानसिक रूप से अधिक स्थिर, अधिक संवेदनशील और अधिक रचनात्मक होता है।समस्या कला में नहीं, हमारी सोच में है। लोग यह समझ नहीं पाते कि चित्रकला जीवन को सिर्फ सुंदर नहीं बनाती, बल्कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है। जिस दिन समाज यह महसूस कर लेगा कि कलाकार बनने का अर्थ सिर्फ पेंटिंग बेचना नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ना है, उस दिन चित्रकारिता से दूरियां नहीं, नजदीकियां बढ़ेंगी।चित्रकला मनुष्य को वह सिखाती है जो कोई पुस्तक नहीं सिखाती—धैर्य, संतुलन, गहराई, और जीवन के रंगों का वास्तविक अर्थ। इसलिए मेरा मानना है कि लोग चित्रकारिता से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें फिर से रंगों की भाषा सिखाने की जरूरत है। जब उन्हें यह एहसास होगा कि कला सिर्फ कैरियर नहीं, एक मनोवैज्ञानिक उपचार है, तब चित्रकारिता फिर से घर-घर में जन्म लेगी।

Monday, November 10, 2025

विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है-डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन


(विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है)डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन

इंसान का जाना एक भौतिक घटना है — शरीर की उपस्थिति का अंत या दूरी — लेकिन उसकी बेवफाई एक मानसिक घटना है, जो चेतन और अवचेतन मन दोनों में गहरी छाप छोड़ जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इंसान की स्मृतियाँ केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उन घटनाओं से जुड़े भावनात्मक अनुभवों से निर्मित होती हैं।जब कोई हमें धोखा देता है, तो मस्तिष्क में एमिग्डाला (amygdala) नामक भाग सक्रिय हो जाता है, जो भय, दर्द और असुरक्षा जैसी भावनाओं को लंबे समय तक संचित रखता है। इसीलिए शरीर तो भूल जाता है, पर मन नहीं। यह मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है कि सकारात्मक भावनाएँ जल्दी मिट जाती हैं, जबकि नकारात्मक अनुभव लंबे समय तक स्मृति में स्थिर रहते हैं।
दरअसल, बेवफाई केवल किसी व्यक्ति से विश्वासघात नहीं होती, बल्कि यह हमारे स्व-मूल्यांकन पर भी प्रहार करती है। व्यक्ति सोचता है कि “मैं इतना गलत क्यों था कि धोखा खा गया?” — और यही प्रश्न उसकी चेतना को बार-बार कुरेदता रहता है। यही कारण है कि इंसान चला जाए तो शरीर अनुपस्थित हो जाता है, लेकिन उसकी बेवफाई “अनुभव” बनकर मन के भीतर जीवित रहती है।मनोविज्ञान कहता है कि जब हम किसी से गहरा जुड़ाव बनाते हैं, तो मस्तिष्क में “ऑक्सीटोसिन” और “डोपामिन” जैसे रासायनिक हार्मोन उत्पन्न होते हैं, जो आनंद और विश्वास का संकेत देते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति बेवफाई करता है, तो वही रासायनिक तंत्र ध्वस्त हो जाता है — और मस्तिष्क को यह झटका लंबे समय तक भावनात्मक दर्द के रूप में महसूस होता है।इसलिए, यह कहना एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है कि —
“इंसान चला जाता है, मगर उसकी बेवफाई याद रहती है,”
क्योंकि शरीर की दूरी से अधिक विश्वास का टूटना दर्द देता है। समय बीतता है, लोग बदलते हैं, लेकिन बेवफाई की स्मृति हमारे आत्म-सम्मान की दरारों में हमेशा गूंजती रहती है — जब तक व्यक्ति उसे क्षमा या स्वीकृति के माध्यम से पार नहीं कर लेता। यह अनुभव हमें सिखाता है कि हर विदाई हानि नहीं होती, कुछ विदाइयाँ स्वयं की पहचान का आरंभ होती हैं।

डॉ. चन्द्रपाल राजभर
(चित्रकार, चिंतक एवं मनोवैज्ञानिक लेखक)