(विषय: इंसान चला जाता है मगर उसकी बेवफाई याद रहती है)डॉ. चन्द्रपाल राजभर का चिंतन
इंसान का जाना एक भौतिक घटना है — शरीर की उपस्थिति का अंत या दूरी — लेकिन उसकी बेवफाई एक मानसिक घटना है, जो चेतन और अवचेतन मन दोनों में गहरी छाप छोड़ जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इंसान की स्मृतियाँ केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उन घटनाओं से जुड़े भावनात्मक अनुभवों से निर्मित होती हैं।जब कोई हमें धोखा देता है, तो मस्तिष्क में एमिग्डाला (amygdala) नामक भाग सक्रिय हो जाता है, जो भय, दर्द और असुरक्षा जैसी भावनाओं को लंबे समय तक संचित रखता है। इसीलिए शरीर तो भूल जाता है, पर मन नहीं। यह मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है कि सकारात्मक भावनाएँ जल्दी मिट जाती हैं, जबकि नकारात्मक अनुभव लंबे समय तक स्मृति में स्थिर रहते हैं।
दरअसल, बेवफाई केवल किसी व्यक्ति से विश्वासघात नहीं होती, बल्कि यह हमारे स्व-मूल्यांकन पर भी प्रहार करती है। व्यक्ति सोचता है कि “मैं इतना गलत क्यों था कि धोखा खा गया?” — और यही प्रश्न उसकी चेतना को बार-बार कुरेदता रहता है। यही कारण है कि इंसान चला जाए तो शरीर अनुपस्थित हो जाता है, लेकिन उसकी बेवफाई “अनुभव” बनकर मन के भीतर जीवित रहती है।मनोविज्ञान कहता है कि जब हम किसी से गहरा जुड़ाव बनाते हैं, तो मस्तिष्क में “ऑक्सीटोसिन” और “डोपामिन” जैसे रासायनिक हार्मोन उत्पन्न होते हैं, जो आनंद और विश्वास का संकेत देते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति बेवफाई करता है, तो वही रासायनिक तंत्र ध्वस्त हो जाता है — और मस्तिष्क को यह झटका लंबे समय तक भावनात्मक दर्द के रूप में महसूस होता है।इसलिए, यह कहना एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है कि —
“इंसान चला जाता है, मगर उसकी बेवफाई याद रहती है,”
क्योंकि शरीर की दूरी से अधिक विश्वास का टूटना दर्द देता है। समय बीतता है, लोग बदलते हैं, लेकिन बेवफाई की स्मृति हमारे आत्म-सम्मान की दरारों में हमेशा गूंजती रहती है — जब तक व्यक्ति उसे क्षमा या स्वीकृति के माध्यम से पार नहीं कर लेता। यह अनुभव हमें सिखाता है कि हर विदाई हानि नहीं होती, कुछ विदाइयाँ स्वयं की पहचान का आरंभ होती हैं।
डॉ. चन्द्रपाल राजभर
(चित्रकार, चिंतक एवं मनोवैज्ञानिक लेखक)
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