Tuesday, November 18, 2025

चित्रकारिता से लोग दूरियां बना रहे हैं- डॉ.चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट का एक चिंतन

आज लोग चित्रकारिता से दूरियां इसलिए बना रहे हैं क्योंकि उनका मन कला की गहराई को समझने से पहले ही बाज़ार और लाभ-हानि की भाषा में उलझ जाता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है कि मनुष्य उस काम से बचता है, जिसमें तुरंत परिणाम दिखाई न दे। लेकिन कला—विशेषकर चित्रकला—एक ऐसा साधन है जहाँ फल से पहले अभ्यास, अनुशासन, धैर्य और आत्मसंवाद की लंबी यात्रा होती है। आज की तेजी से भागती दुनिया में लोग इस यात्रा को बोझ समझ लेते हैं।चित्रकला सिर्फ कागज़ पर रंग भरना नहीं है, बल्कि मन की परतों को खोलना है। बच्चा जब पहली बार रेखाएँ बनाता है तो वह रेखाएँ उसके अंतर्मन का आईना होती हैं। परंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसकी तुलना शुरू कर देता है—"इससे अच्छा तो फलाँ बनाता है", "कला में करियर नहीं बनता", "सिविल, बैंक या कंप्यूटर सीखो"। यह नकारात्मक तुलना धीरे-धीरे उसकी सृजनात्मकता को डरा देती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, भय और संकोच वह दो दीवारें हैं जो किसी भी कलाकार की उड़ान रोक देती हैं।उदाहरण के लिए, एक छात्र जिसने कक्षा 6 में कमाल की पेंटिंग बनाई थी, उसने 10वीं में आते-आते रंग उठाना तक बंद कर दिया। कारण पूछा गया तो बोला—“सर, लोग कहते हैं कला से कुछ बनता नहीं।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं होते, यह व्यक्ति की आत्म-धारणा पर चोट करते हैं। कला छोड़ देने की शुरुआत यहीं से होती है।दरअसल, कला कमाने से पहले कमल की तरह खिलना सिखाती है। जब एक चित्रकार कैनवास पर रंग रखता है, तो वह सिर्फ दृश्य नहीं बनाता बल्कि अपना मन साफ करता है, तनाव कम करता है और भावनाओं को स्वस्थ दिशा देता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से कला से जुड़ा होता है, वह मानसिक रूप से अधिक स्थिर, अधिक संवेदनशील और अधिक रचनात्मक होता है।समस्या कला में नहीं, हमारी सोच में है। लोग यह समझ नहीं पाते कि चित्रकला जीवन को सिर्फ सुंदर नहीं बनाती, बल्कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है। जिस दिन समाज यह महसूस कर लेगा कि कलाकार बनने का अर्थ सिर्फ पेंटिंग बेचना नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ना है, उस दिन चित्रकारिता से दूरियां नहीं, नजदीकियां बढ़ेंगी।चित्रकला मनुष्य को वह सिखाती है जो कोई पुस्तक नहीं सिखाती—धैर्य, संतुलन, गहराई, और जीवन के रंगों का वास्तविक अर्थ। इसलिए मेरा मानना है कि लोग चित्रकारिता से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें फिर से रंगों की भाषा सिखाने की जरूरत है। जब उन्हें यह एहसास होगा कि कला सिर्फ कैरियर नहीं, एक मनोवैज्ञानिक उपचार है, तब चित्रकारिता फिर से घर-घर में जन्म लेगी।

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