Monday, December 22, 2025

पुस्तक- मोटिवेशनल गजल

1
हौसला
हौसलों की लौ अगर दिल में जली रहती है
हर अँधेरी रात फिर खुद ही ढली रहती है।

हार मानो मत कभी हालात के तूफ़ानों से
जिद्द की एक नाव अक्सर पार चली रहती है।

जो गिरा है वही उठने का हुनर जानता है
चोट खाकर ही तो तक़दीर पली रहती है।

ख़्वाब सच होते हैं बस कोशिशों के साए में
नींद आराम की मेहनत से छली रहती है।

भीड़ में खोना बहुत आसान है ऐ मेरे दोस्त
अपनी पहचान मगर अलग बनी रहती है।

वक्त देता है परीक्षा, हौसला देता है फल
सब्र की राह हमेशा ही भली रहती है।

जो न झुकता है कभी झूठे तक़ाज़ों के आगे
उसकी पेशानी सदा ऊँची ढली रहती है।
गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

2
मंजिल 
चल पड़ा जो अपने दम पर, वही मंज़िल पाएगा
भीड़ के पीछे चला तो नाम खो जाएगा।

टूटकर बिखरना भी एक सबक सिखा जाता है
जो संभल गया वही आगे दूर तक जाएगा।

ख़ौफ़ की दीवार ऊँची सिर्फ़ नज़र आती है
हौसलों का क़दम बढ़े तो गिर ही जाएगा।

आज जो चुप है वही कल बोलता इतिहास में
सब्र का हर एक लम्हा रंग लाएगा।

हार के शोर में मत अपनी आवाज़ खो,
सच का साया देर से ही सही छा जाएगा।

थक के रुकना भी बुरा नहीं सफ़र में मगर
रुक के बैठा जो हमेशा पीछे रह जाएगा।

जो जला है खुद उजाला बाँटने की चाह में
वक़्त उसका नाम सूरज सा बताएगा।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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3
इरादा
अब झुकेंगे नहीं हम, यह इरादा लिख दिया है,
डर के माथे पर भी सच का क़ायदा लिख दिया है।

जो सहे सदियों की चुप्पी, वो भी बोले आज फिर से,
ख़ामोशी के ख़िलाफ़ हमने नारा लिख दिया है।

बेड़ियाँ टूटी नहीं तो सोच को आज़ाद कर दिया,
जेल की दीवार पर भी रास्ता लिख दिया है।

भूख ने सिखला दिया है इंक़लाब का सबक़,
सूखी रोटी ने लहू में फ़लसफ़ा लिख दिया है।

जो हुकूमत ने कहा था “मत उठाना सिर कभी”,
उसी सिर ने आज हर एक फ़ैसला लिख दिया है।

हम नहीं माँगेंगे हक़, अब छीनना सीखा है,
मुट्ठियों ने वक्त का नक़्शा नया लिख दिया है।

जो जले अँधेरों में बनकर मशाल-ए-राह,
उस शहीद ने हर नस में हौसला लिख दिया है।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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4
ख़ामोश हथियार 
हमने ख़ामोशी को भी अब हथियार बना लिया,
चुप्पियों में ही बग़ावत का इज़हार कर लिया।

जो लुटाते थे सदा सपने हमारे नाम पर,
हमने उनकी नींद पर पहरा तैनात कर लिया।

भूख की भाषा समझ आई तो जाना यह भी सच,
पेट ने संसद से भी ऊँचा इन्क़लाब कर लिया।

अब किताबें सिर्फ़ अलमारी की शोभा नहीं है,
हर हर्फ़ ने ख़ुद को मशाल-ए-राह कर लिया।

जो कहे “सब ठीक है” उस झूठ से समझौता नहीं है,
हमने सच बोलने का ख़तरा स्वीकार कर लिया।

कायरों की भीड़ से रिश्ता हमारा टूट गया ,
डर को पैरों तले रौंद कर इतिहास लिख लिया।

आज जो सड़कों पे है, कल वही संविधान है,
जन ने ख़ुद को पहली बार सरकार लिख लिया।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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5
स्याही 
मैं स्याही में लहू मिलाकर सच लिख रहा हूँ,
डर की सलाख़ों पर भी आवाज़ लिख रहा हूँ।

जो बिक गई थीं सदियों से ज़मीरे सत्ता में,
उनके मुक़ाबिल नया इंसान लिख रहा हूँ।

यह जो अख़बारों में सजा झूठ का मेला है,
उस हर झूठ के सामने विद्रोह लिख रहा हूँ।

मेहनतकश के हाथ की रेखा मिटा दी गई,
उसी हथेली पर नया इतिहास लिख रहा हूँ।

मत पूछो मुझसे अदब, नर्मी, तहज़ीब अभी,
वक़्त के काग़ज़ पे मैं इन्क़लाब लिख रहा हूँ।

जो कह रहे थे “कल लिखना”, “अभी नहीं बोलो”,
उसी आज में मैं हर एक सवाल लिख रहा हूँ।

यह ग़ज़ल नहीं, यह गवाही है दौर की,
मैं अपने हिस्से का पूरा जवाब लिख रहा हूँ।
गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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6
प्रश्न आसान नहीं थे, फिर भी सच लिख आया हूँ
आंसर शीट पर मैं अपना वजूद लिख आया हूँ।

जो सिखाया गया था चुप रहो, वही काट दिया
गलत सवालों के आगे विद्रोह लिख आया हूँ।

नंबर काटे गए तो क्या, डर पास हो गया
मैं हर एक उत्तर में हौसला लिख आया हूँ।

सिलेबस में नहीं था जो, वही सबसे ज़रूरी था
मैं जीवन का पूरा अनुभव लिख आया हूँ।

काट दी जाएगी शायद यह कापी जाँच में
फिर भी हर पन्ने पे इन्क़लाब लिख आया हूँ।

जो कह रहे थे “लिखना मत, यही समझदारी है
उनकी समझ के बाहर जवाब लिख आया हूँ।

यह परीक्षा सिर्फ़ नौकरी की नहीं थी दोस्त
मैं आदमी हूँ—यह पहचान लिख आया हूँ।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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7
वक्त 
वक्त रुकता नहीं, मगर राह दिखा जाता है
जो संभल जाए वही आगे निकल जाता है।

आज जो बीज पसीने से ज़मीं में बोया है
वक्त उस बीज को कल पेड़ बना जाता है।

हार पल भर की होती है अगर दिल न थके
वक्त ठहरे हुए पत्थर भी हिला जाता है।

जो अभी टूट के बैठा है, उसे क्या मालूम
वक्त गिरकर भी इंसान को उठा जाता है।

कल पे टालो मत अभी जो भी ज़रूरी है यहाँ
वक्त हर काम का अंजाम बता जाता है।

जो समय की क़द्र करता है वही जीतता है
वक्त लापरवाह को पीछे छोड़ जाता है।

आज चुपचाप जो मेहनत में लगा रहता है
वक्त कल उसका ही सिक्का चला जाता है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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8
जरूरी है 
हर बात में जीत नहीं, हार भी ज़रूरी है
ज़िंदगी समझने को ठोकर भी ज़रूरी है।

कहने से कुछ नहीं होता, करना ही पड़ता है
ख़्वाबों के सच होने को मेहनत ज़रूरी है।

जो आज थक कर बैठ गया, वो कल रोएगा
थोड़ा सा चलते रहना हर दिन ज़रूरी है।

लोगों की बातों में मत अपना वक़्त गँवाओ
ख़ुद की निगाह में इज़्ज़त ज़रूरी है।

सबका साथ मिले, ये मुमकिन नहीं यहाँ
ख़ुद पर भरोसा रखना सबसे ज़रूरी है।

जल्दी में फैसले अकसर गलत निकलते हैं
कुछ बातों में ठहरना भी ज़रूरी है।

ज़िंदगी आसान नहीं, पर नामुमकिन भी नहीं
बस रोज़ थोड़ा बेहतर होना ज़रूरी है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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9
किताब 
हर किताब सिर्फ़ काग़ज़ की कहानी नहीं होती
कुछ किताबें ज़िंदगी जीना सिखा देती हैं।

जो सवाल मन में दबे रहते हैं बरसों तक
एक सच्ची किताब उन्हें बोलना सिखा देती है।

अकेलेपन में जब कोई साथ नहीं देता
तब किताब ही इंसान को सहारा देती है।

जो ठोकरों से थक कर रुक गया था राह में
किताब उसे फिर से खड़ा होना सिखा देती है।

हर पन्ना कहता है—रुक मत, आगे बढ़
किताब हार के आगे झुकना मना कर देती है।

डिग्रियाँ नहीं, सोच बदलती है असल में
किताब आदमी को आदमी बना देती है।

जो रोज़ थोड़ा पढ़ता है, थोड़ा समझता है
वही किताब एक दिन मुक़द्दर लिखा देती है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 
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10
कदम
पहला क़दम ही अक्सर सबसे भारी होता है
चल पड़े तो रास्ता खुद ही सहारा होता है।

रुक के सोचना ठीक है, डर के बैठना नहीं
हर सफ़र एक छोटे क़दम से ही शुरू होता है।

जो आज एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाता
कल वही अपनी जगह पर ही ठहरा होता है।

क़दमों की आवाज़ से डरता है अँधेरा भी
चलने वाला आदमी कभी अकेला होता है?

धीरे चल, मगर रुक मत—यही उसूल रख
क़दम थमे तो सपना भी अधूरा होता है।

हर रोज़ एक क़दम ईमानदारी से बढ़ाओ
यही आदत एक दिन बड़ा मुक़द्दर होता है।

गज़ल 
डॉ चन्द्रपाल राजभर आर्टिस्ट 

Sunday, December 21, 2025

तुम्हारी नजरें कुछ कह जाती हैं -गीत

तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,
बिन छुए ही जो दिल को छू जाए,
वो हर धड़कन मेरी बन जाती हैं।

होठों की लकीरों में छुपी बातों को,
आँखों की चमक यूँ उजागर करती है,
एक मुस्कान की हल्की सी बारिश,
रूह के आँगन को तर करती है।
सांसों में घुली जो खुशबू तुम्हारी,
हर लम्हा नया एहसास जगाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

पलकों का झुकना, फिर नज़र उठना,
कह जाता है जो लफ्ज़ न कह पाए,
एक नज़र में सौ वादे लिखकर,
सीधे दिल के पन्ने पर उतर जाए।
नज़रों का ये जादू संभाले न संभले,
नीयत भी राहें बदल जाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं,

उल्फत की गलियों में जो कदम रखा,
एक धड़कन वहीं ठहर सी गई,
तुम्हारी आँखों में जो घर पाया,
मेरी हर तन्हाई बिखर सी गई।
सीने में जो धड़कन आज भी धड़के,
वो तुम्हारी धड़कन कहलाती है।
तुम्हारी नज़रें कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी में भी शोर मचा जाती हैं

गीत 
डॉ चन्द्रपाल राजभर (आर्टिस्ट)

Friday, December 19, 2025

स्कूल गीत

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

मेहनत करबा ता ,मेहनतिया बोली होss, 
चमक उठी तोहर,किस्मतिया बोली हो।।
गाँव नगरिया से निकाला पाऊंवा हो, ।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

झोलवा औ, कंपनियां , कितबिया लेला हो।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।

गरीबी के दीवार ई ,गिरेगी हिम्मत से
होला सपनवा ,साकार मेहनत से
 इल्मों का दीप जरेला हिम्मत से, 
अंधियारा दूर भगवा, तू पढ़ी ला मेहनत से

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

जिंनगी तोहार औ, दुआर सुधर जाई
पढ़ी-लिखी लेबा तो परिवार सुधर जाए 
गांव समाज के सम्मान बढ़ जाए
देशवा के अपने, मान बढ़ी जाई
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।।।

झोलावा औ, कंपियां, कितबिया लेला हो।।2।।
चला चला मोरे ललना, स्कूलवा चला हो।।2।।

गीत 
डॉक्टर चन्द्रपाल राजभर
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2
चलो स्कूल की गलियां, जहां सपने सजते हैं
मेहनत की धूप में यहां, जीवन फूल बनते हैं
ज्ञान की रोशनी लेकर, अंधियारा मिटता है
चलो स्कूल की गलियां, जहां भविष्य खिलता है
चलो स्कूल की गलियां........

यहां कलम की ताकत से, तकदीर बदलती है
छोटी-सी कोशिश भी, ऊंचाई को छू लेती है
हर बच्चे के मन में, विश्वास पलता है
चलो स्कूल की गलियां, जहां जीवन संवरता है
चलो स्कूल की गलियां........

यहां गुरु का आशीष, सागर सा गहरा है
हर एक नया सवेरा, उम्मीदों का पहरा है
यहीं से हर इंसान, इतिहास बदलता है
चलो स्कूल की गलियां, जहां भारत बढ़ता है
चलो स्कूल की गलियां........